Parenting

बच्चों को कब लगता है कि झूठ बोलना भी एक विकल्प है।

Parentune Support
1 to 3 years

Created by Parentune Support
Updated on Feb 06, 2017

बच्चों को कब लगता है कि झूठ बोलना भी एक विकल्प है।

यकीनन् आपने सुना होगा कि बच्चे अपने आस-पास के माहौल से सबसे ज्यादा सीखते हैं और उनके माता-पिता उनके पहले गुरू और आदर्श होते हैं। इसलिये अगर वे झूठ बोलना सीखते हैं तो संभव है कि उन्होने परिवार के किसी बड़े सदस्य को ऐसा करते हुये देखा हो। कुछ हद तक आप सभी इससे सहमत होंगे, जब हमने अपने जीवनसाथी से फोन पर ‘मैं घर पर नहीं हूँ’ या कोई अन्य छोटा-मोटा झूठ बोलने के लिये न कहा हो। यह हमारे लिये नुकसानदायक न हो पर बच्चे लिये यह झूठ बड़े काम आने वाला औजार है। अगर बच्चे किसी चीज से बचने की कोषिष कर रहे होते हैं तो उन्हें भी झूठ बोलना गलत नहीं लगता क्योंकि उनके माता-पिता भी ऐसा ही करते हैं, पर बच्चे यहाँ से झूठ बोलना नहीं सीखते।

चलिये! कुछ ऐसा याद करने की कोशिश करते हैं जहाँ आपके बच्चे ने गलती से एक कांच का गुलदस्ता तोड़ दिया हो। आप तुरंत उससे पूछते हैं ‘क्या तुमने ऐसा किया?’ वह हामी भरता है और अचानक आपकी आवाज ऊंची हो जाती है, आप बच्चे पर चिल्लाना शुरू कर देते हैं जैसे ‘यह तुमने क्या किया’...‘तुम कभी बात नहीं सुनते’...तुम्हे चोट भी लग सकती थी... वगैरह, वगैरह।

हाँ, आप शायद गुलदस्ता टूटने के बजाय अपने बच्चे को इससे लगने वाली चोट के लिये ज्यादा चिंतित थे पर क्या आपने, अपने बच्चे का चेहरा देखा था। बच्चा भी गुलदस्ता टूटने से नहीं डरता बल्कि वह आपकी ऊंची आवाज और आपके चेहरे के भावों को देखकर डरता है। आमतौर पर इस तरह के मामले में हम देखते हैं कि बच्चा भाग कर अपने माता-पिता के पीछे छिपने की कोशिश करता है जो या तो कम गुस्से में होते हैं या गुस्सा ही नहीं होते।

आप समझ सकते हैं कि बच्चा डर जाता है और हमदर्दी चाहता है। बात यहीं खत्म करके हम आगे बढ़ जाते हैं पर हमारे बच्चे नहीं। आपकी अति-चिंता और गुस्सा उनकी याद में बस जाता है और यदि ऐसा कुछ दुबारा होता है तो आपके उस जगह पर पहुंचने से पहले ही वे सहम जाते हैं। आप फिर पूछते हैं कि क्या तुमने यह किया, बच्चा डर जाता है और जवाब नहीं दे पाता। दिलचस्प बात है कि हम गुस्से में तो होते हैं पर अपने बच्चे पर नहीं क्योंकि हम मानते हैं कि यह हमारे बच्चे ने नहीं किया और बच्चा भी यही मानता है। ऐसा तब होता है जब बच्चों को लगता है कि यदि मेरे माता-पिता नहीं जानते कि यह मैंने किया है, वो मुझ पर गुस्सा नहीं होंगे और अगली बार ऐसा होने पर जब आप बच्चे से पूछेंगे कि क्या यह तुमने किया, वह नहीं में सिर हिलायेगा और अपनी बात को पक्का कर देगा।

इसलिये यह सबसे जरूरी बात है कि यदि आप नहीं चाहते कि आपका बच्चा झूठ बोले तो उसके सच बोलने पर उसके साथ बुरा बर्ताव कभी न करें।

साथ ही, चूंकि बच्चा घर के दायरे से बाहर निकलता है और अपने जैसे और बच्चों और बड़ों से मिलता है, वह बहुत सी बातें आस-पास के माहौल से सीखता है। ऐसे में यदि आपका बच्चा झूठ बोलना सीख रहा है तो यह पता लगाना बहुत जरूरी है।

इसका पहला संकेत उसके हाव-भाव से मिलेगा। हांलांकि मैं शारिरिक भाषा का विशेषज्ञ नहीं हूँ पर मैंने कुछ किताबें पढ़ीं हैं जिसमें मैंने जीवन में आने वाले ऐसे संकेतों को देखा है। हमारे शरीर की बनावट झूठ बोलने के अनुकूल नहीं होती (जहाँ तक नैतिक रूप से कुछ भी गलत करने का संबंध है) अतः जब भी हम कुछ गलत करते हैं या महज झूठ ही बोलते हैं तो हमारा शरीर हमें ऐसा करने से रोकने की कोशिश करता है। बच्चे जैसे ही झूठ बोलना शुरू करते हैं, प्रतिक्रिया स्वरूप उसके हाथ मुंह को ढंकने की कोशिश करते हैं फिर धीरे-धीरे हाथ उसकी नाक, गाल या माथे तक जाते हैं। जितनी जल्दी हो सके इस लक्षण को पकड़ने की कोषिष करें। कुछ अन्य बातें भी हैं जैसे उसके बोलने की गति या लहजे में बदलाव, पलकें झपकाना, एक ही बात को दोहराना, आँखे चुराना, हाथ जेब में होना या पीछे बांध लेना और हाथों को इधर-उधर हिलाना वगैरह। आप इन लक्षणों को जितना जल्दी हो सके पकड़ें क्योंकि समय के साथ झूठ छिपाने वाला चेहरा मजबूत हो जाता है और झूठ, शरीर को वश में करना सीख लेता है जिससे यह संकेत दिखाई देना कम हो जाते हैं।

आप एक ही सवाल को अलग-अलग ढंग से पूछ सकते हैं। शक बिल्कुल न होने दें, अपनी आवाज पर काबू रखें और शिशु के बेतुकेपन को देखने की कोशिश करें। इस समय आप अपने शिशु पर विश्वास रखें और उनका यकीन करें। अपने शिशु को एहसास करायें कि आप उन पर विश्वास करते हैं और आपका यह विश्वास ही शिशु को हर बार सच बोलने के लिये तैयार करता है। लेकिन मान लें कि यह सब करने के बाद भी अगर आपका शिशु झूठ बोलता है तो ऐसा होने पर आपको क्या करना है, यह जानना बहुत जरूरी है। इसमें दो पहलू सबसे खास हैं। पहला, अपने शिशु को खासकर दूसरे लोगों के बीच शर्मिंदा न करें और दूसरा, यह जानने की कोशिश करें कि किस वजह से आपका शिशु  झूठ बोलने के लिये मजबूर हुआ। अपने शिशु से बात करें, उसे सुरक्षा का अहसास दें (शिशु उस बात को बताने से बहुत डरते हैं जो उन्हें झूठ बोलने के लिये मजबूर करती है), इसकी असली वजह जानें, इतने अच्छे से पेश आयें कि गलती करने के बाद भी उसे लगे कि वह आपसे बात कर सकता है, वह उस बात से न डरे जिसकी वजह से वह झूठ बोलने के लिये मजबूर हुआ क्योंकि वैसा कुछ भी नहीं है। और जब आप अपने शिशु को समझायें या बात करें तो आपमें भी धैर्य होना चाहिये। हो सकता है कि शिशु को अपनी बात कहने में समय लगे लेकिन यदि आप धैर्य खो देंगी तो यह दो कदम आगे और चार कदम पीछे जाने के जैसा होगा।

आप, अपनी और शिशु की गलतियों को सीख में बदलने की कोषिष करें। हो सकता है कि वह फलियों से भरा जार गिरा दे तो जार के टुकडों को इकठ्ठा करें और इससे चिड़ियों के दाना चुगने का बर्तन बना दें, अपने शिशु को सिखायें कि जीवन के लिये खाना कितना जरूरी है और कैसे एक फली को पाने के लिये चिड़िया दिन भर मेहनत करती है।

यह सब ठीक है लेकिन, यदि आपका शिशु कोई ऐसा सच बोले जो आपको बिल्कुल पसंद न हो और उसकी बात आपको नाराज कर दे। ऐसे में आप, अपने शिशु के साथ कैसे पेश आयेंगी? यहाँ आपको चालाकी से काम लेने की जरूरत है। आपने शिशु को झूठ बोलना नहीं सिखाया, और वह हमेशा सच बाले यह भी आपके हाथ में है। इसलिये बुरा न मानें और सबसे पहले सच बोलने के लिये शिशु की तारीफ करें। आप जानते हैं कि ऐसा कहना बहुत कठिन है लेकिन न चाहते हुये भी उसे बतायें कि सच बोलने की उसकी आदत से आप खुश हैं।

कुल मिलाकर नीचे दी हुई बातों को अपनायेंः

1. संयम रखने का अभ्यास करें, खासकर गुस्सा आने पर

2. अपने शिशु के हाव-भाव पर नजर रखें और उसमें अचानक होने वाले बदलाव पर गौर करें

3. एक ही प्रश्न को अलग-अलग ढंग से पूछें पर प्यार के साथ

4. आपका शिशु झूठ क्यों बोलता है, यह समझने के लिये उससे बात करें

5. अपने शिशु पर भरोसा करें

6. गल्तियों को सीखने के मौके में बदलें

7. सच बोलने के लिये अपने शिशु की तारीफ करें

8. शिशु के सामने कभी झूठ ने बोलें और उसके लिये आदर्श बनें

हालांकि अच्छे माता-पिता होने के आपके अन्दर बहुत सी अच्छाइयां होनी चाहिये पर ऊपर लिखी बातों को अपना कर आप आसानी ऐसा कर सकते हैं।

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