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अपने साथ शिशु को कराए यह 5 दिनचर्या के पालन

Parentune Support
3 to 7 years

Created by Parentune Support
Updated on May 19, 2018

अपने साथ शिशु को कराए यह 5 दिनचर्या के पालन

शिशु को जन्म देने के बाद के शुरूआती दिन मेरे लिये बड़ी मस्ती भरे थे, परिवार में मेरे पहली बार माँ बनने की वजह से हमारी बड़ी देखभाल की जा रही थी और बड़ा प्यार लुटाया जा रहा था। हालांकि, धीरे-धीरे सभी रिश्तेदारों के जाने के बाद मैं अपने परिवार- पति और बेटे के साथ अकेली रह गई और मुझे लगा कि अपने खाने और आराम तक के लिये समय निकाल पाने में मझे कठिनाई हो रही है। देखभाल ठीक से हो रही थी और सभी लोगों का साथ भी मिल रहा था तो फिर गड़बड़ी कहाँ थी।

 

आखिरकार हमेशा की तरह मेरे पति मेरे बचाव के लिये आये और कहा कि जब तक माँ होते हुये मैं अपने और शिशु के रोजाना कामों को समय पर करने के लिये दिनचर्या नहीं बनाती तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि चीजें आसानी से चलेंगी? यह चोट करने वाली बात थी। हाँ, मैंने कुछ भी तय नहीं किया था या आप कह सकती हैं मैं इस काबिल ही नहीं थी कि अपने और शिशु के लिये कब क्या करना है -यह तय कर सकूं, पर कुछ दिनों की मेहनत के बाद मैं दिनचर्या का एक नमूना बनाने में सफल हो गयी और मुझे अब भी इसकी खूबियों का फायदा मिल रहा है।   

 

1. दिनचर्या और इसकी अहमियतः शिशु की दिनचर्या? क्या शिशु इसका पालन कर सकता है? शिशु को कब, क्या करना है, कौन तय करेगा? हम इस तरह के सवालों और इनके मजाक उड़ाने वाले जवाबों से घिरे होते हैं। पर मैं अपने इरादे पर अड़ी रही और अपने शिशु की दिनचर्या का नमूना तैयार कर लिया जिसने मुझे सिखाया कि अपने शिशु के लिये मुझे कब, क्या करना है, जिससे मैं उसे आसानी से संभाल सकूं। इससे मुझे यह समझने में भी मदद मिली कि शिशु कब सोयेगा, कब उठेगा और वह कितने घंटे सोता है जिससे मुझे अपने दिन भर के कामों की योजना बनाना भी आसान हो गया। इसे अपनाने में उन्हे कुछ समय लगेगा पर बिल्कुल, वे इसके साथ तालमेल कर लेंगे और समझने लगेंगे कि कब खेलना है, कब खाना खाना है और कब सोना है। दिनचर्या के साथ शिशु खुश रहता है; सेहतमंद रहता है और चुस्त रहता है, और इससे पहले की वह किसी चीज की मांग करे, वह उसे मिल जाती है। मैंने पाया कि दिनचर्या शिशु को समझदार बनाती है और उसमें भरोसे का अहसास पैदा करती है।

 

2. दिनचर्या तय करनाः शिशु की दिनचर्या तय करने के लिये सबसे काबिल व्यक्ति आप - उसकी माँ हैं। एक माँ होने के नाते आप शिशु के सोने-जागने, खेलने-कूदने और खाने-पीने के तौर-तरीकों को समझती हैं और उसकी दिनचर्या तय करने की जमीन यही है। बहुत आसान है! इन सब चीजों को समय के हिसाब से बांट दें और आप शिशु के लिये एक शानदार दिनचर्या के साथ तैयार है। यह आप खुद के बनाये हुये नियम हैं, शिशु को कुछ नहीं करना है। यह आप ‘माता-पिता’ को करना है, तो इसे रोज करें और कुछ दिनों बाद आप पायेंगे कि आपके शिशु ने इसके साथ तालमेल कर लिया है।

 

3. दिनचर्या तय करने के फायदेः शिशु की दिनचर्या तय करने आप और शिशु दोनों के लिये फायदेमंद होता है। आइये देखते हैं-

 

1. माँ के लियेः दिनचर्या तैयार करना अपने-आप में वह उपहार है जो आप खुद को दे सकती हैं। आप जानती हैं कि शिशु कब सो जाता है या कितनी देर तक सोता है, तो आप भी आराम कर सकती हैं। आपको अपनी योजना उसी हिसाब से बनानी है।

2. आप दोनों के लियेः यहाँ तक कि, दिनचर्या तय होने से आपके जीवनसाथी के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं। शिशु के होने का यह मतलब नहीं है कि आप जीवनसाथी के साथ अपने रिश्ते को ताक पर रख दें। शिशु को सेहतमंद माहौल देने के लिये माँ-बाप के बीच सेहतमंद रिश्ता होना बहुत जरूरी है। शिशु को अच्छी नींद में सो जाने पर कुछ चुराये हुये पल आपके रिश्ते में गर्मी लाते हैं।

 

3. देखभाल करने वाले के लियेः शिशु की देखभाल के लिये चाहे आपने कोई आया रखी हो या परिवार में इसके लिये कई लोग हों पर दिनचर्या तय होने से उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं होती। यदि शिशु को घर पर छोड बाहर जाना है, तो आप बिना चिंता के जा सकती हैं क्योंकि आपने दिनचर्या बना ली है और शिशु भी इसे समझता है। बस इस बात का ध्यान रहे कि घर पर फोन लगाकर पता करती रहें कि सबकुछ तय चीजों के हिसाब से चल रहा है या नहीं।

 

दिनचर्या तय करते समय ध्यान रखने वाली बातेंः

 

दिनचर्या तय करते समय आपको कुछ बातें जरूर ध्यान में रखनी चाहिये। शिशु कुछ नहीं करते, यह सब आपको अपनाना है, तो यह करते समय या किसी और शिशु की दिनचर्या के पालन के बारे में पूछ-ताछ करते समय, आपको यह पक्का करना है-

 

  • इसे लचीला और मजेदार रखेंः दिनचर्या का खाका कुछ लचीला होना चाहिये। मौसम, समय और हालात बदलने के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश होनी चाहिये और यह मजेदार भी होना चाहिये। दिनचर्या ऐसी हो जिसके हिसाब से चलने में मजा आये न कि यह बोझ लगे और इसके पालन में कठिनाई हो।

 

  • किसी चीज का पूरापन उबाऊ भी होता हैः किसी चीज का हर तरह से पूरा और सटीक होना कोई मजाक नहीं और न ही कोई चीज ऐसी हो सकती है। दिनचर्या में हर मिनट के बेहतर इस्तेमाल से मतलब न रखें या इसके साथ कभी-कभार ही तालमेल बैठे, ऐसा भी न हो। यह आपके लिये और आपके शिशु की देखभाल करने वाले के लिये परेशान करने वाला हो सकता है।

 

 

  • बात का बतंगड़ न बनायेंः यदि किसी को दिनचर्या की किसी खास बात से परेषानी है तो इस बात पर अड़ जाने से बचें। कभी-कभी आपके लिये यह करना आसान होता है, औरों के लिये नहीं, पर अगर वे इसके साथ चलने की कोशिश कर रहें तों उनकी तारीफ करें और इसे जानने के लिये उनकी मदद करें।

 

  • माता-पिता दोनों का शामिल होना जरूरीः किसी दिनचर्या के पालन की जिम्मेदारी शिशु की माँ और बाप दोनों की होती है। इसमें एसा नहीं होता कि आप में से कोई एक ही इसे माने, दूसरे की मदद भी जरूरी होती है। अगर पिता कुछ कर रहा है तो माँ मदद करे और माँ के व्यस्त होने पर पिता।

  • धीरे-धीरे बदलाव लायेंः अगर दिनचर्या में कुछ ऐसा है जिसमें बदलाव की जरूरत है तो यह धीरे-धीरे करना चाहिये न कि एकदम। शिशु तालमेल तो करते हैं पर धीरे-धीरे। तो एक समय में एक चीज से शुरू करें। शिशु को पहले एक बदलाव के साथ तालमेल करने दें और उसके बाद दूसरे के लिये कोशिश करें    

 

कृपया अपने विचार और जानकारी साझा करें। मुझे अच्छा लगेगा यदि माता-पिता इसके बारे अपनी विचार देंगे।

 

  • 1
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| Jul 18, 2017

Thank you very much it's very useful

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