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एडीएचडी (ADHD) से जुड़ी कुछ विशेष बातें

Parentune Support
1 से 3 वर्ष

Parentune Support के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Apr 19, 2018

एडीएचडी ADHD से जुड़ी कुछ विशेष बातें

बहुत से माँ-बाप एडीएचडी के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं रखते हैं। एडीएचडी अर्थात ‘अटेंशन डिफिसिट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर’, यह दिमाग से संबंधित एक विकार है जो बच्‍चों और बड़ों दोनों में होता है। लेकिन बच्‍चों में इस रोग के होने की ज्‍यादा संभावना होती है। इस बीमारी के होने पर आदमी का व्‍यवहार बदल जाता है और याद्दाश्‍त भी कमजोर हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ‘अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी’ यानी एडीएचडी का मतलब है, किसी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं कर पाना। माना जाता है कि कुछ रसायनों के इस्तेमाल से दिमाग की कमज़ोरी की वजह से ये कमी होती है।

एडीएचडी मुख्य तौर पर 6 से 12 साल की उम्र के बच्चों को होता है और इसका सीधा असर उनकी पढाई पर पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक स्‍कूल के बच्‍चों को एडीएचडी  4% से  12% के बीच प्रभावित करता है। यह लड़कियों की तुलना में लड़कों को ज्यादा होता है। एडीएचडी की समस्या ऐसे परिवारों में अधिक बिगड़ सकती है जहां घर में तनाव का वातावरण रहता है और जहां पढ़ाई पर जरूरत से अधिक जोर देने की प्रवृत्ति रहती है। यदि शुरू में ही काबू न किया जाए तो यह बाद में जीवन में समस्याएं पैदा कर सकती है।

 

 सबसे पहले तो आपके लिए बच्चों में एडीएचडी के लक्षण पहचानना बहुत जरूरी है। इसके प्रमुख लक्षण हैं:

 

  • स्कूल और घर पर लापरवाही के कारण बहुत सी गलतियां करना।
  • बच्चे द्वारा आपके निर्देशो की अवहेलना करना, उन्हें न सुनना और उन पर ध्यान न देना। 
  • किसी भी कार्य को ठीक से न करना। 
  • नोटबुक व होमवर्क आदि भूल जाना।
  • बातें भूलना व बहुत ज्यादा चंचल होना। 
  • एक जगह पर न बैठ पाना, बेचैन रहना। 
  • संयम न रख पाना।
  • अक्सर क्लास में चिल्लाना।

  

वैसे तो एडीएचडी का कोई स्थायी उपचार नहीं है लेकिन इसके कुछ निदान उपलब्ध हैं जो इससे पीड़ित बच्चे के लिए काफी लाभदायक हो सकते हैं।


इससे निदान के लिए कोई एक परीक्षण नहीं है। इसके लक्षणों के आधार पर ही इस बीमारी का निदान संभव है। अगर आपके बच्‍चे का व्‍यवहार इस बीमारी से मेल करता है तो इस आधार पर इस विकार का निदान होता है। इसके लिए विशेषज्ञ बच्‍चे की मेडिकल हिस्‍ट्री की जांच करता है, वह परिवार के अन्य सदस्‍यों से इस बारे में पूछता है। इसके अलावा चिकित्‍सक यह भी देखता है कि घर और स्कूल के वातावरण में बच्‍चे को कोई अन्‍य परेशानी तो नही है, जिसके कारण वह ऐसा व्‍यवहार कर रहा है। इसके बाद सुनने और देखने की क्षमता, चिंता, अवसाद या अन्य व्यवहार समस्याओं की जांच की जाती है। इसके लिए अपने बच्चे को एक विशेषज्ञ के पास परीक्षण के लिए ले जाइए। इसमें बच्‍चे के आईक्‍यू लेवल की भी जांच होती है।

 

अगर आपके बच्चे को एडीएचडी है तो अपने चिकित्सक से संपर्क करें , या शिक्षक आपको सूचित करें कि आपके बच्चे को पढ़ने में दिक्‍कत है, इसका व्‍यवहार अन्‍य बच्‍चों से अलग है। एडीएचडी की समस्या बच्चों में कोई साधारण बात नहीं है बल्कि एडीएचडी के लक्षण दिखाई देने पर आपको जल्द से जल्द मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। अपने बच्चे में इस समस्या को दूर करने के लिए मेडिसिनल ट्रीटमेंट दे सकती हैं।

 

बिहेवियर थैरेपी के जरिए भी इसका उपचार किया जाता है। साथ ही एहतियात के तौर पर बच्चों के कमरे में कम से कम चीजें रखें ताकि उनका मन ज्यादा न भटके। एडीएचडी वाले बच्चों को कुशल प्रबंधन के माध्यम से लाभ पहुंचाया जा सकता है। सबसे पहले तो अपने बच्चे का एक नियमित रूटीन सेट करें। स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करें, ताकि आपका बच्चा यह जान ले कि किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है। उन्हें काम के बदले सराहें और रिवार्ड दें। जैसे होमवर्क करने पर उनका मनपसंद का खाना आदि दें। अच्छे काम पर प्रशंसा या पुरस्कार देने से सकारात्मक व्यवहार को मजबूत किया जा सकता है। अच्छे व्यवहार को बढ़ाने के लिए आप अंक या स्टार सिस्टम का उपयोग करने की कोशिश कर सकते हैं। उनके साथ मारपीट बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। यदि वह कोई गलती करता है तो उसे संयम और सूझ-बूझ के साथ समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि उसने जो किया है वह गलत है। 
 

यदि ऐसा दिखे कि बच्चा आपा खो रहा है, तो उस पर ध्यान दें और उसे किसी अन्य गतिविधि में व्यस्त कर दें। बच्चे के दोस्तों को घर पर आमंत्रित करें। इससे बच्चे को मिलने-जुलने में आसानी होगी। लेकिन यह सुनिश्चित करें कि बच्चा स्वयं पर नियंत्रण न खोए। साथ ही बच्चे के सोने का एक नियमित रूटीन सेट करें। अपने बच्चे को अच्छी नींद सोने दें। सोने के समय उसे किसी रोमांचक गतिविधि में न उलझने दें। एडीएचडी से ग्रस्‍त लड़कों के लिए फिश ऑयल भी हो सकता है मददगार।
 

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रारम्भ में ही इस समस्या पर ध्यान दें। जैसे- जैसे बच्चा बड़ा होता जाएगा, समस्या का निदान कठिन होता जाएगा।

 

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