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जानिए बदलाव के बाद और कितना सख्त हुआ पोक्सो एक्ट

Anubhav Srivastava
3 से 7 वर्ष

Anubhav Srivastava के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Jul 18, 2018

जानिए बदलाव के बाद और कितना सख्त हुआ पोक्सो एक्ट

देश में छोटी बच्चियों के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ व रेप की घटनाओं को देखते हुए 2012 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने  एक विशेष कानून बनाया गया था। इस कानून को पोक्सो एक्ट का नाम दिया गया था। 2018 में इस कानून में कुछ बदलाव करके इसे और सख्त बनाया गया है। आज इस ब्लॉग में हम आपको देंगे पोक्सो एक्ट की पूरी जानकारी।

क्या है पोक्सो एक्ट/ What Is POSCO Act In Hindi

पोक्सो (POCSO) एक्ट का पूरा नाम ‘Protection Of Children From Sexual Offences Act’ (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट) है। इस एक्ट के तहत नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले अपराधों के मामलों में कार्रवाई की जाती है। इसके तहत बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों में सुरक्षा प्रदान की जाती है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आता है। यह कानून लड़के और लड़कियों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत रजिस्टर्ड होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है।

पोक्सो एक्ट के प्रावधान / Provision Of POSCO Act In Hindi

  • इस एक्ट में यौन शोषण की परिभाषा में यौन उत्पीड़न, अश्लील साहित्य, सेक्सुअल और गैर सेक्सुअल हमले को शामिल किया गया है। एक्ट में भारतीय दंड संहिता 1860 के अनुसार सहमति से सेक्स करने की उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 साल किया गया है।
  • (क). एक्ट के अनुसार अगर कोई व्यक्ति (बच्चा, युवा व बुजुर्ग सभी) किसी बच्चे यानी 18 साल से कम उम्र के बच्चे या बच्ची के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के कोई यौन कृत्य करता है तो यह पोक्सो एक्ट के दायरे में आएगा।  
  • यदि पति या पत्नी में से कोई भी 18 साल से कम उम्र का है और वे आपस में भी यौन कृत्य करते हैं, तो यह भी अपराध की श्रेणी में आएगा और उस पर केस दर्ज हो सकता है।
  • इस एक्ट के तहत सभी अपराधों की सुनवाई एक स्पेशल कोर्ट में कैमरे के सामने होती है। एक्ट में कहा गया है कि सुनवाई के दौरान यह कोशिश होनी चाहिए कि पीड़ित के माता-पिता या बह जिस पर भरोसा करता है मौजूद रहें। 
  • अगर अभियुक्त  किशोर है, तो उसके ऊपर किशोर न्यायालय अधिनियम 2000 (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) के तहत केस चलाया जाएगा।
  • यदि पीड़ित बच्चा दिव्यांग है या मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर है, तो विशेष अदालत को उसकी गवाही को रेकॉर्ड करने या उसे समझने के लिए अनुवादक व विशेष शिक्षक की सहायता लेनी चाहिए। 
  • अगर आरोपी ने कुछ ऐसा अपराध किया है जो बाल अपराध कानून के अलावा अन्य कानून में भी क्राइम है, तो उसे सजा उस कानून के तहत होगी जो सबसे सख्त हो।
  • इसमें खुद को निर्दोष साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर होता है। इसके अलावा इसमें गलत आरोप लगाने, झूठी जानकारी देने व किसी की छवि को खराब करने पर भी सजा का प्रावधान किया गया है।
  • ऐसे लोग जो गलत काम के लिए बच्चों का व्यापार करते हैं, वे भी इस कानून के दायरे में आते हैं।
  • इस अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि यदि कोई शख्स ये जानता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ  है, तो इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो उसे 6 महीने की जेल व आर्थिक दंड की सजा मिल सकती है। 

यह कानून बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है। इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल सहित अन्य जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। इसके अलावा पुलिस की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि वह मामले की जानकारी 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) को भी दे। ताकि सीडब्ल्यूसी बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके।
 इस एक्ट में ये भी प्रावधान किया गया है कि केस की सुनवाई अदालत बंद कमरे में दोस्ताना माहौल में करे। बच्चे की पहचान गुप्त रखी जाए।
 पोक्सो के तहत स्पेशल कोर्ट पीड़ित बच्चे को दी जाने वाली मुआवजे की राशि का निर्धारण कर सकता है।
एक्ट में ये भी कहा गया है कि केस को यौन शोषण होने की तारीख से 1 साल के अंदर निपटाया जाना चाहिए। 
 

पोक्सो एक्ट की धाराएं व सजा 

  • इस एक्ट की धारा-3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को परिभाषित किया गया है। इसमें अगर कोई शख्स किसी बच्चे के प्राइवेट पार्ट में कुछ डालता है, या ऐसा करने के लिए कहता है तो यह धारा-3 के तहत अपराध होगा। इसमें 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। 
  • एक्ट की धारा-4 में बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले को शामिल किया गया है। इसमें उम्रकैद और अर्थदंड का प्रावधान है।
  • इस कानून की धारा-6 में वे मामले आते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म के बाद गंभीर चोट पहुंचाई गई हो, इसमें 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
  • धारा-7 व धारा-8 में वे मामले आते हैं, जिनमें बच्चों के प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ की जाती है। इस धारा के दोषियों को 5-7 तक की कैद की सजा व जुर्माने का प्रावधान किया गया है। 
  • धारा-11 में बच्चों के साथ सेक्सुअल हैरेसमेंट को परिभाषित किया गया है, जिसके तहत अघर कोई व्यक्ति बच्चों को गलत नियत से छूता है या सेक्सुअल हरकत करता है, या उसे पोर्नोग्राफी दिखाता है तो उसे इस धारा के तहत 3 साल कैद की सजा हो सकती है।
  • वहीं इस एक्ट में 2018 में कुछ बदलाव भी किए गए हैं। अब इसमें और ठोस सजा जोड़ी गई है। नए बदलाव के अनुसार अब 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप के मामले में मौत की सजा होगी। जबकि 16 साल से कम उम्र की लड़की से रेप करने पर न्यूनतम सजा को 10 साल से बढ़ाकर 20 कर दिया गया है।

 

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