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क्या गर्भावस्था में मछली का सेवन लाभदायक है?

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Updated on Dec 12, 2017

क्या गर्भावस्था में मछली का सेवन लाभदायक है

बचपन में एक कविता पढ़ते थे, “मछली जल की रानी है”। आज की प्रतियोगी और भाग दौड़ की जिंदगी में मछली, दिमाग को तंदरुस्त और स्फूर्तिवान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर प्राकितिक स्त्रोत की बात करें तो, मछली ही एक जीव है जिसकी वसा में ओमेगा-3 भरपूर्ण मात्रा में पाया जाता है। यह आपके बच्चो के मानसिक और शारीरिक विकास के में ये वसा संजीवनी का काम करती है। तुलनात्मक दृष्टि से देखे तो वो संतान जिनकी माताओं ने गर्भावस्था के दौरान भोजन में मछली का प्रयोग किया था, जन्म के समय दूसरे बच्चों से स्वस्थ होते हैं। तो आइये जानें कि गर्भावस्था में मछली के सेवन से होने वाले फ़ायदे क्या क्या हैं
 

1. बीमारियों से बचाव

मछली का तेल में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। इस तेल के सेवन से ह्रदय रोग, अर्थराइटिस और कैंसर जैसी घातक बीमारियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा इसमें पेटाथेनिक एसिड और डी.एच. ए (डिकॉसहेक्सिनाइक एसिड) पाया जाता है, जो तनाव से मुक्ति दिलाता है। अगर गर्भावस्था में गर्भवती महिला इस तेल का सेवन करती है तो यह उसके तथा उसके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य को बेहद लाभ पहुँचाता है। मछ्ली के प्रयोग से गर्भवती स्त्री भी आंतरिक तौर पर खुद को स्वस्थ महसूस करती है।
 

2. मस्तिष्क का विकास

मस्तिष्क की लगभग 75% कोशिकाए गर्भावस्था में विकसित होती हैं। शेष 25% का विकास जन्म के एक वर्ष के बाद शुरू होता है। इसलिए गर्भावस्था में मछली का उपयोग गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास को बढ़ाता है। मछली के तेल में पाए जाने वाले ओमेगा 3 फैटी एसिड में जो डी.एच.ए पाया जाता है वह भ्रूण के मस्तिष्क विकास और ज्ञानात्मक विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है। व्यावहारिक दृष्टि से देखे तो, बच्चों की ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता,पढने की क्षमता, भावनात्मक अभिव्यक्ति की कार्यप्रणाली मनुष्य के दिमाग के जिस हिस्से में कार्य करती है ये वसा उस हिस्से को विकसित करती है। मछली के इन्ही गुणों के कारण इसे ब्रेन फ़ूड यानी की “मस्तिष्क भोजन” का नाम दिया गया है।

 

3. तनाव से मुक्ति

एक शोध के अनुसार खून में डी.एच. ए और सेरोटोनिन की अधिक मात्रा ही व्यक्ति को तनाव ग्रस्त कर देता है। ऐसे में अगर गर्भवती महिला डी.एच. ए युक्त मछली के तेल का सेवन करे तो इससे अवसाद, उदासी, चिंता, व्याकुलता, मानसिक थकान, तनाव, आदि मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। मछली में पाए जाने वाली वसा कई खतरनाक बीमारियों से भी बचाता है, उदाहरण के तौर पर ओमेगा-3(वसा) के प्रयोग से अल्जाइमर, अवसाद और डिमेंशिया जैसी बीमारियों से बचाव होता है।
 

4. गर्भस्थ शिशु का शारीरिक विकास

एक शोध के अनुसार गर्भावस्था के समय गर्भवती महिला के द्वारा मछली का सेवन करने से गर्भस्थ शिशु में रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही साथ यह गर्भस्थ शिशु को एलर्जी, हृदय संबंधी एवं पाचन संबंधी घातक बीमारियों से भी बचाता है। इसलिए गर्भावस्था में महिला द्वारा मछली का सेवन अत्यधिक फायदेमंद है। इसमें प्रोटीन, विटामिन डी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो एक बच्चे के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। गर्भवती महिला व शिशु की हड्डियों की इसके तेल से मालिश की जाए तो इससे दोनों की हड्डियां मजबूती होती हैं।
 

5. पोषक तत्वों की आपूर्ति

गर्भावस्था में मछली का सेवन करने से आपको और आपके शिशु को विभिन्न पोषक तत्व मिलते हैं। इससे बच्चा डिस्लेक्सिया और एडीएचडी जैसी बीमारियों से दूर रहता है। सरकारी आकड़ों की मानें तो औसतन 100 में 5 बच्चे इन बीमारियों का शिकार होते हैं और पोषक तत्वों की कमी ही इसका कारण होती है। अविकसित मष्तिस्क होने के कारण ऐसे बच्चे सामान्य जीवन नहीं जी पाते और कई बार मानसिक विकलांगता का शिकार भी हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में खाने के रूप में मछली का उपयोग अनिवार्य हो जाता है।
 

नोट : गर्भावस्था के दौरान मछली का सेवन किया जाना चाहिए, लेकिन इसका सेवन कम मात्रा में करें।
 

हालांकि, प्रेगनेंसी के दौरान सारी मछलियों का सेवन नहीं करने की सलाह दी जाती है। खासकर, एक सप्ताह में तैलीय मछली की दो से ज्यादा सर्विंग न खाएं। तैलीय मछलियों में बांगड़ा, पेड़वे या माथी मीन, रावस या सामन मछली, ट्राउट, चूरा, पिलचर्ड और हिल्सा या भिंग शामिल हैं।
 

ऐसे में, आप इन मछलियों को खा सकते हैं, लेकिन वह भी एक सीमित मात्रा में :  सी ब्रीम, टरबोट, हलिबेट (कुप्पा / जेडार), डॉगफिश, एन्कोवी, हिलसा, छोटी समुद्री मछली, इंद्रधनुषी मछली, सैल्मन, सार्डिन, व्हाइटफ़िश।
 

इन मछलियों का सेवन भूलकर भी न करें : स्वोर्डफ़िश, शार्क, टाइलफिश, बांगड़ा, फ्रोजेन टूना, धारीदार बास, ब्लू फिश।
 

गर्भ के समय तो मां को भोजन में मछली का प्रयोग करना ही चाहिए, बच्चे के जन्म के बाद भी ये आवाश्यक है,’कम से कम तब तक जब तक माँ को ही दुग्धपान कराना हो’। महत्वपूर्ण ये है कि इस समयवधि में मछली का प्रयोग माँ के स्वस्थ का भी पूरक होता है। सप्ताह में एक मछली का प्रयोग माँ को आंतरिक तौर पर मज़बूत रखता है। जीवविज्ञान में हो रहे शोध की मानें तो, गर्भावस्था के दौरान मछली जच्चा और बच्चा दोनों के लिए अमृत होती है। विश्व का वैज्ञानिक इतिहास हो या पौराणिक इतिहास, एक प्राकृतिक स्रोत के रूप में मछली का प्रयोग आवश्यक और अतुलनीय रहा है

 

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