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क्या आप जानते हैं हिन्दू धर्म के 16 पवित्र संस्कार और महत्व ?

क्या आप जानते हैं हिन्दू धर्म के 16 पवित्र संस्कार और महत्व ?

प्रकाशित: 23 फ़र॰ 2019

अपडेटेड: 19 सित॰ 2019

संस्कार मनुष्य के लिए बहुत जरूरी है। सनातन धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। मानव जीवन को पवित्र व मर्यादित करने के लिए प्राचीन काल में ऋषियों ने 16 संस्कार बनाए। इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। ये संस्कार हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।

 

क्या हैं हिंदू धर्म के अनुसार 16 संस्कार ?

पूरे 16 संस्कारो को जाने के लिए ब्लॉग पढ़े...

  1. गर्भाधान संस्कार – यह सबसे पहला संस्कार है। शास्त्रों में बताया गया है कि मनचाही, योग्य, गुणवान और आदर्श संतान की प्राप्ति के लिए इस संस्कार को किया जाता है।
     
  2. पुंसवन संस्कार – गर्भ ठहरने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम व संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए। गर्भ के तीसरे महीने में विधिवत पुंसवन संस्कार कराया जाता है। इस संस्कार के प्रमुख लाभ ये हैं कि इससे स्वस्थ, सुंदर व गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
     
  3. सीमन्तोन्नयन संस्कार – यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठे और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। बच्चे में अच्छे गुण, अच्छा स्वभाव और अच्छे कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी तरह आचार-विचार, रहन-सहन व व्यवहार करती है। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य मकसद होता है।
     
  4. जातकर्म संस्कार – बच्चे का जन्म होते ही इस संस्कार को किया जाता है। इससे बच्चे के कई प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं। इस संस्कार के तहत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिससे बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो सके।
     
  5. नामकरण संस्कार – यह पांचवा संस्कार बच्चे के जन्म के 10वें दिन किया जाता है। इस दिन सूतिका का निवारण व शुद्धिकरण किया जाता है। यह प्रसूति कार्य घर में हुआ हो, तो उस कमरे को धोकर साफ करना चाहिए। शिशु व माता को भी स्नान कराके नये स्वच्छ वस्त्र पहनाया जाते हैं।
     
  6. निष्क्रमण संस्कार – निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकलना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार में शिशु को सूर्य व चंद्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। इसका मकसद भगवान भास्कर के तेज व चंद्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए इस संस्कार के दौरान पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि उनका बच्चा स्वस्थ रहे और लंबी आयु प्राप्त करे।
     
  7. अन्नप्राशन संस्कार – यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय यानी 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत की जाती है। [अधिक पढ़ें - कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार और क्या है इसका महत्व?]
  8. मुंडन संस्कार – इस संस्कार में पहली बार बच्चे के बाल उतारे जाते हैं। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है व दिमाग तेज होता है। इसके अलावा उसके बालों में चिपके किटाणु भी नष्ट होते हैं। वैसे लौकिक रीति यह है कि मुंडन संस्कार बच्चे की आयु एक वर्ष होने तक करा लें। अगर 1 साल में मुंडन नहीं करा पाए, तो 2 साल पूरा होने पर तीसरे साल में जरूर करा लें।
     
  9. विद्या संस्कार  –  इस संस्कार के माध्यम से बच्चे को उचित शिक्षा दी जाती है। इसमें मां-बाप बच्चे को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराते हैं।
     
  10. कर्णवेध संस्कार – इस संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। इसमें बच्चे के कान छेदे जाते हैं। इसका मकसद बच्चे की शारीरिक व्याधि से रक्षा करना है। दरअसल कान छेदने से एक्यूप्रेशर होता है और इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इसके अलावा इससे श्रवण शक्ति भी बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम होती है। इसके साथ ही कान छेदने का दूसरा मकसद आभूषण पहनने के लिए भी है।
     
  11. उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार – उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी इस संस्कार का काफी महत्व है। जनेऊ यानी यज्ञोपवित में मौजूद तीन सूत्र, तीन देवता – ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से बच्चे को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है। 
     
  12. वेदारंभ संस्कार – यह संस्कार व्यक्ति के पाठन और पढ़न के लिए है। इसके तहत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है। प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्यन व विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिए योग्य आचार्यों के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था, लेकिन मौजूदा समय में यह संस्कार अब न के बराबर होता है।
     
  13. केशांत संस्कार – केशांत संस्कार का अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या करना अध्ययन से पहले भी केशांत किया जाता है। मान्यता है कि गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति से पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करे।
     
  14. समावर्तन संस्कार – समावर्तन संस्कार का अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार प्राचीन समय में किया जाता था। इसका मकसद होता था ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।
     
  15. विवाह संस्कार – विवाह संस्कार सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके तहत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के जरिये सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है। 
     
  16. अंत्येष्टी संस्कार – अंत्येष्टी संस्कार अंतिम संस्कार होता है। शास्त्रों के अनुसार हिंदू धर्म में इंसान की मृत्यु यानी देह त्याग के बाद मृत शरीर को अग्नि को समर्पित किया जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है, इसी से चिता जलाई जाती है। इसका मतलब है कि विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी, उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है। 

 

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