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हो सकता है आप ही नहीं समझ पा रहे हों अपने बच्चे को। इसे जरूर पढ़ें

Parentune Support
1 से 3 वर्ष

Parentune Support के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Nov 01, 2017

हो सकता है आप ही नहीं समझ पा रहे हों अपने बच्चे को। इसे जरूर पढ़ें

बच्चा अपनी मां के साथ में खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है लेकिन कभी-कभी मां के मन में इस बात को लेकर आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है कि वह अपने बच्चे का पालन-पोषण सही ढंग से कर रही हैं या नहीं या उसे ठीक से समझ पा रहे हैं या नहीं। क्योंकि बच्चे की उम्र के शुरुआती साल ऐसे होते हैं, जिसमें उसे विशेष देखभाल की जरूरत होती है। उसके लिए दुनिया की हर चीज नयी होती है, जो कुछ वो देखता है, उसे सीखने की उत्सुकता होती है। उसमें अच्छे- बुरे की समझ भी नहीं होती और इस उम्र में बच्चे के साथ एक अच्छे दोस्त की तरह बर्ताव करें ताकि आपका बच्चा हमेशा स्वस्थ और हंसता-खिलखिलाता रहे। बच्चे की उचित देखभाल के लिए जरूरी है कि माएं उनकी जरूरत को पहचानें। छोटे बच्चे रो कर अपनी जरूरतों के बारे में बताते हैं ऐसे में जरूरी है कि आप अपने बच्चे की आदतों को जानें।

छोटे बच्चों विशेष रूप से नवजात शिशुओं में यह स्वाभाविक क्षमता होती है कि वे आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बार-बार रोते हैं। दरअसल बच्चा रोकर ही आपके साथ अपना संवाद स्थापित करता है और इस उम्र में बच्चे में इतनी समझ नहीं होती कि वह अपनी जरूरतों की प्राथमिकता को पहचान सके। इसलिए उसे जब भी कोई बात नापसंद होती है तो वह सिर्फ रोता है। आमतौर पर जब भी बच्चे को भूख लगती है, जब वह कोई नया चेहरा देखता है, जब कोई नई आवाज सुनता है, जब उसे बड़ों द्वारा गोद में उठाए जाने की मुद्रा पसंद नहीं आती या फिर उसे कोई भी बात नापसंद होती है तो वह रोकर ही अपना विरोध प्रदर्शित करता है या वह अपने चेहरे की मुद्राओं से जता देता है कि उसे कोई बात अच्छी नहीं लगी। कभी-कभी बच्चे थकान की वजह से भी रोते हैं।

अगर आपका बच्चा गहरी नींद से चौंक कर जागने के बाद रोने लगे तो सबसे पहले आप उसकी नैपी चेक करें कि कहीं वह गीलेपन की वजह से तो नहीं रो रहा। फिर आप उसकी गर्दन छूकर देखें कि कहीं उसकी गर्दन से पसीना तो नहीं आ रहा क्योंकि कई बार बच्चे गर्मी की वजह से भी रोते हैं। बड़े बच्चे बोलकर या रोकर अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं। अगर कुछ खाने- पीने से उसके पेट में कोई तकलीफ है अथवा उसे स्वास्थ्य संबंधी कोई अन्य समस्या है तो भी बच्चा लगातार रोता रहता है। ये कुछ ऐसे सामान्य कारण हैं, जिन्हें आप आसानी से पहचान कर यह अंतर समझ सकती हैं कि आपका बच्चा किस कारण से रो रहा है या किस कारण से दुखी है।

जन्म के बाद शुरुआती छह महीने में बच्चे बहुत जल्दी-जल्दी नैपी गीला करते हैं। इसलिए इस उम्र में हर घंटे बच्चे की नैपी को चेक करके जरूर बदलना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चे की नैपी बदलना भले ही आपके लिए थका देने वाला काम है पर बच्चे को नैपी रैशेज से बचाने के लिए ऐसा करना बहुत जरूरी है। यदि बच्चा बोल सकता हो तो वह बोलकर अपनी जरूरत बता सकता है। बच्चे की नियमित जरूरतों को अपने दिमाग में बिठा लें और अगली बार उसके रोने या बताने से पहले ही उसकी जरूरत पूरी करने की कोशिश करें।

मालिश से न केवल बच्चे के शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है बल्कि उसके शरीर की कसरत भी होती है। साथ ही मां के हाथों का प्यार भरा स्पर्श बच्चे को सुरक्षा का अहसास दिलाता है। इसलिए बच्चे के लिए मालिश बहुत जरूरी है और रोजाना बच्चे को नहलाने से पहले उसकी मालिश जरूर करनी चाहिए। यह भी ध्यान रखें कि आप किसी बड़े- बुजुर्ग अथवा जानकार व्यक्ति से बच्चे की मालिश करने का सही तरीका जान लें। क्योंकि गलत तरीके से की गई मालिश से बच्चे को दर्द हो सकता है, वह रोने लगेगा और उसे फायदे के बजाय नुकसान भी हो सकता है। बच्चे को नहलाने के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। धीरे-धीरे जब बच्चा बड़ा होने लगे तो उसे खुद नहाने के लिए प्रेरित करें।

बड़े बच्चों को उनकी शारीरिक व मानसिक विकास की जरूरत के अनुसार खेलकूद का सामान उपलब्ध कराएँ और उन्हे खेलने के लिए प्रेरित करें। बच्चे की जानकारी में वृद्धि के लिए प्रारम्भ में बच्चे को इशारों में या दिखाकर शरीर के अंगों, फलों या पशु-पक्षियों के बारे में बतायें, उन्हें छोटे- छोटे शब्द सिखाना शुरू करें। बच्चे के कुछ बड़ा होने पर उसे अपने साथ धार्मिक व ऐतिहासिक स्थानों पर ले जा सकती हैं। इससे प्रारम्भ से ही उनका मानसिक विकास हो सकेगा।

कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चे हों या बड़े सबकी अपनी जरूरतें होती हैं। बच्चे अपनी जरूरतों को रोकर या इशारों में बता सकते हैं। इसलिए अपने बच्चे की सांकेतिक भाषा व मनोभावों को सबसे पहले समझने की जरूरत है। बच्चे की भावनाओं को समझने के लिए घर के बड़े सदस्यों की भी सहायता ले सकती हैं क्योंकि उनके पास बच्चे के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी निभाने का बेहतर अनुभव होता है।

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