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स्वास्थ्य

लॉकडाउन में स्क्रीन टाइम का बढ़ना है बड़ी समस्या, ये 10 टिप्स बहुत काम के हैं

Prasoon Pankaj
3 से 7 वर्ष

Prasoon Pankaj के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया May 29, 2020

लॉकडाउन में स्क्रीन टाइम का बढ़ना है बड़ी समस्या ये 10 टिप्स बहुत काम के हैं
विशेषज्ञ पैनल द्वारा सत्यापित

  कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखकर दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। लॉकडाउन के लागू होने से पहले ही एहतियात के तौर पर तमाम स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए थे। बात एक या दो हफ्ते की होती तो कोई बात नहीं लेकिन यहां तो महीने दर महीने से कोरोना का प्रकोप लगातार जारी है। काम-काज के लिए वैकल्पिक इंतजामों को खोजने का प्रयास किया जाने लगा। अधिकांश कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम को लागू कर दिया। बच्चों की पढ़ाई का भी नुकसान होने लगा फिर अधिकांश स्कूलों ने ऑनलाइन क्लासेज शुरू करने का फैसला किया। गुड़गांव की रहने वाली प्रीति की बेटी परिधि एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में पढ़ती है। कोरोना के चलते पिछले दो-तीन महीनों से स्कूल बंद हैं लेकिन उनकी बेटी के स्कूल में ऑनलाइन क्लासेज चल रहे हैं। प्रीति एक तरफ तो खुश हैं कि भले स्कूल बंद हैं लेकिन उनकी बेटी की पढाई तो जारी है लेकिन इसके साथ ही उनकी चिंता ये भी बनी हुई है कि उनके बच्चे को 4-5 घंटे मोबाइल पर बैठना पड़ रहा है यानि स्क्रीन टाइम बढ़ जाने को लेकर चिंतित हैं। प्रीति का कहना है कि विशेषज्ञों ने हमें शुरू से बताया कि अपने बच्चे को मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल करने दें लेकिन अभी क्या कर सकते हैं क्योंकि बिना मोबाइल के तो अब बच्चे ऑनलाइन क्लासेज कर ही नहीं सकते हैं। प्रीति की चिंता इस बात को लेकर भी है कि इसके अलावा उनकी बेटी टीवी भी देखती हैं और मना करने के बावजूद मोबाइल पर गेम्स भी खेल लेती है। अब स्क्रीन टाइम बढ़ जाने से प्रीती बच्चे की सेहत को लेकर परेशान है। ये समस्या सिर्फ प्रीति की नहीं बल्कि लाखों पैरेंट्स के साथ है, मुमकिन है कि आप भी इस बात को लेकर परेशान होंगी। इस ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं कि मौजूदा हालात में स्क्रीन टाइम बढ़ जाने की समस्या को लेकर एक्सपर्ट्स का क्या कहना है और आप कैसे इसका समाधान निकाल सकती हैं। 

सबसे पहले जानिए कि क्या होता है स्क्रीन टाइम?

डॉक्टरों के मुताबिक अगर बच्चे ज्यादा देर तक मोबाइल डेस्कटॉप लैपटॉप या टीवी के संपर्क में रहते हैं तो उन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है जैसे कि मानसिक और शारीरिक तौर पर नुकसान हो सकते हैं। स्क्रीन टाइम का मतलब ये होता है कि आपका बच्चा दिन के 24 घंटे में कितनी देर मोबाइल टीवी लैपटॉप या टैबलेट जैसे गैजेट पर बिता रहा है। अमेरिकन स्कूल ऑफ पीड्रियाटिक्स ने बच्चे के स्क्रीन टाइम को लेकर दिशा निर्देश जारी किए थे।

  • 18 महीने से कम उम्र के बच्चे को मोबाइल जैसे गैजेट का प्रयोग नहीं करने देना चाहिए

  • जब आपका बच्चा डेढ़ साल से 2 साल के बीच का हो तो उसको उच्च गुणवत्ता वाले कार्यक्रम ही दिखाएं

  • अगर बच्चा 2 साल से 5 साल के बीच का है तो उसको 1 घंटे से ज्यादा मोबाइल इत्यादि पर समय बिताने से रोकें।

  • 6 साल या इससे ज्यादा उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम निर्धारित करें। ये भी ख्याल रखें कि आपका बच्चा किस तरह के कार्यक्रमों को देख रहा है। बहुत ज्यादा देर तक स्क्रीन टाइम बिताने पर बच्चे के सोने, शारीरिक गतिविधियां या अन्य जरूरी काम के लिए समय निकालना मुश्किल हो सकता है।

 स्क्रीन टाइम को लेकर लॉकडाउन के बाद के सर्वे क्या कहते हैं? / Screen time goes up during coronavirus lockdown In Hindi

लॉकडाउन के बाद बच्चे और पैरेंट्स के रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत बदलाव आए हैं। इसको लेकर अब अलग-अलग प्रकार के सर्वे भी सामने आ रहे हैं।

  1. एक सर्वे के मुताबिक तकरीबन 88 फीसदी पैरेंट्स का ये मानना है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ गया है यानि कि पहले के मुकाबले अब बच्चे गैजेट का ज्यादा प्रयोग कर रहे हैं।

  2. सर्वे के मुताबिक 43 फीसदी पैरेंट्स ऐसे हैं जो अपने बच्चों की गतिविधियों पर निगाह रख रहे हैं।

  3. सर्वे के मुताबिक 50 फीसदी से ज्यादा पैरेंट्स ने स्वीकार किया कि उनके बच्चे अब ज्यादा उत्तेजित और बेचैनी महसूस कर रहे हैं 

  4. 37 फीसदी पैरेंट्स ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान बच्चों के खुश रहने पर असर साफ दिख रहा है।

  5. 41 फीसदी पैरेंट्स का ये मानना है कि लॉकडाउन के चलते उनके बच्चों के खाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आ चुका है।

स्क्रीन टाइम बढ़ जाने से  बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ पंकज कुमार का कहना है कि कुछ स्टडीज के मुताबिक अगर बच्चे 6-7 घंटे से ज्यादा स्क्रीन पर बिताते हैं तो उनके साथ कई प्रकार की समस्याएं हो सकती है। जैसे कि जिज्ञासा में कमी, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाना, दोस्तों के साथ असहज होना, संयम का अभाव। इसके अलावा वे मोबाइल या टीवी पर किस तरह के कार्यक्रम देख रहे हैं इसका भी बहुत असर पड़ सकता है। डॉक्टर के मुताबिक ये जानना भी पैरेंट्स के लिए बहुत आवश्यक है कि ऑनलाइन क्लास में जो पढ़ाया जा रहा है बच्चे उसको कितना समझ रहे हैं।

  •  डॉक्टर बताते हैं कि आमतौर पर नॉर्मल अटेंश स्पैन आधा घंटा तक का होता है यानि कि इतने देर तक ही कोई व्यक्ति किसी चीज पर अच्छे तरीके से ध्यान केंद्रित कर सकता है। इसके बाद ध्यान का भटकना सामान्य बात है। यही वजह है कि आपने नोटिस किया होगा कि स्कूल में चलने वाले क्लासेज भी अधिकतम 40 मिनट तक के होते हैं और उसके बाद अगले क्लास के शुरू होने में कुछ मिनटों का ही सही ब्रेक दिया जाता है।

  • डॉक्टरों का सुझाव ये है कि ऑनलाइन क्लास बहुत ज्यादा समय के और उबाऊ ना हो। ऐसे में बच्चे को समझ में नहीं आएगा वहीं दूसरी तरफ टीचर के लिए भी सभी बच्चों से अलग-अलग ये पूछना मुश्किल है कि उनको समझ में आया की नहीं।

हालांकि डॉक्टर ऑनलाइन क्लासेज को महत्वपूर्ण गतिविधी मानते हैं क्योंकि ये बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए जरूरी है लेकिन उनका यही कहना है कि पैरेंट्स कुछ बातों का ध्यान रखें ताकि बच्चे मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहें।

स्क्रीन टाइम से संबंधित परेशानियों से बचने के लिए पैरेंट्स किन बातों का ध्यान रखें? / Screen time goes up during  lockdown - How to keep your eyes healthy, and safe from infections in Hindi

जैसा कि हम जानते हैं कि बच्चे के लिए ऑनलाइन क्लास करना जरूरी है लेकिन इसके साथ ही स्क्रीन टाइम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए ये बहुत जरूरी है कि आप इन बातों का ख्याल रखें।

  • आप अपने घर के अंदर ही बच्चे को शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। एक ही जगह पर लगातार बैठे-बैठे भी उनकी सक्रियता में कमी आ सकती है। इसलिए बीच में ब्रेक लेकर उनको फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रेरित करते रहें।

  • परिवार के साथ समय बिताएं, बच्चे को अंत्याक्षरी,डांस-म्यूजिक जैसे कामों में शामिल करें, उनके परफॉरमेंस को लेकर प्रोत्साहित करते रहें ताकि वे मोबाइल या टीवी पर कम समय बिताएं। इसके लिए ये भी जरूरी है कि आप खुद भी अपने स्क्रीन टाइम को कम करने का प्रयास करें।

  •  यह जरूर नोटिस करते रहें कि हाल के दिनों में आपके बच्चे के अंदर किसी प्रकार के बदलाव तो नहीं नजर आ रहे हैं जैसे कि उदासी, नींद की कमी , या पहले से ज्यादा देर तक सोते रहना, चिड़चिड़ापन। अगर इस प्रकार के लक्षण नजर आ रहे हैं तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।

  • फोन या लैपटॉप का ज्यादा इस्तेमाल करने से क्या बच्चे की आंखों पर भी असर पड़ सकता है। ये सवाल आपके मन में भी आ रहा होगा लेकिन इसके बारे में आंख विशेषज्ञ डॉ संजय धवन का कहा है कि स्क्रीन पर देखने से बच्चे के विजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। डॉ संजय धवन का कहना है कि इससे चश्मे का नंबर बढ़ जाने जैसी समस्या नहीं होती है लेकिन एक ऑनलाइन क्लास से दूसरे क्लास के बीच में 15 मिनट का ब्रेक मिल जाता है तो ये बहुत बेहतर है। लेकिन इसके साथ ही लगाता स्क्रीन पर देखते रहने की वजह से आंखों में पानी आना, आंखों में सूखापन, जलन, लाल हो जाा या आंखों में खिंचाव जैसा महसूस हो सकता है।

  • बच्चे को प्रत्येक 15 मिनट के अंतराल पर एक मिनट के लिए अपनी आंखों को बंद करने के लिए कहें ताकि आंखों को आराम मिल सके।

  • आप बच्चे को मोबाइल की जगह लैपटॉप इस्तेमाल करने के लिए दे सकते हैं ताकि स्क्रीन बड़ी रहे। अगर मोबाइल यूज करते हैं तो मोबाइल का आकार बड़ा होना चाहिए

  • आपका बच्चा कैसे बैठ रहा है इस पर भी ध्यान दें। स्क्रीन और बच्चे की आंखों का लेवल बराबरी पर रहे । पीठ और सिर सीधे रहें।

  • ऑनलाइन क्लास के बाद टीवी देखने और मोबाइल का प्रयोग करने के समय को कम कर दें ताकि स्क्रीन टाइम ज्यादा ना हो जाए।

  • सायकोलॉजिस्ट अनामिका पापड़ीवाल का कहा है कि बच्चे के साथ समय बिताएं। बच्चे के साथ इनडोर गेम्स खेलें, उनको कहानियां सुनाएं और उनकी कहानी भी सुनें। पेंटिंग में रूचि हो तो बनाने के लिए प्रेरित करें।

  • बच्चे की बातों को गौर से सुनें। उनके अजीबोगरीब सवालों का प्यार और धैर्य पूर्वक जवाब देने का प्रयास करें।

  • कोरोना को लेकर ज्यादा नकारात्मक बातें ना करें ताकि उनके मन में भय का माहौल ना बनें । न्यूज चैनलों पर चल रहे डिबेट से बच्चे को दूर रखें।

ये कुछ बातें हैं जिनका आपको ध्यान रखना चाहिए। अच्छा संगीत सुनें, घर में सकारात्मक और प्रेरक बातों के बारे में बच्चे को बताएं। संतुलित आहार लेते रहें और बच्चे के पोषण पर ध्यान रखें। 

आपका एक सुझाव हमारे अगले ब्लॉग को और बेहतर बना सकता है तो कृपया कमेंट करें, अगर आप ब्लॉग में दी गई जानकारी से संतुष्ट हैं तो अन्य पैरेंट्स के साथ शेयर जरूर करें।

इस ब्लॉग को पेरेंट्यून विशेषज्ञ पैनल के डॉक्टरों और विशेषज्ञों द्वारा जांचा और सत्यापित किया गया है। हमारे पैनल में निओनेटोलाजिस्ट, गायनोकोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन, न्यूट्रिशनिस्ट, चाइल्ड काउंसलर, एजुकेशन एंड लर्निंग एक्सपर्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, लर्निंग डिसेबिलिटी एक्सपर्ट और डेवलपमेंटल पीड शामिल हैं।

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