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संयुक्त परिवार और हमारे बच्चे

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Parentune Support के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Dec 28, 2017

 संयुक्त परिवार और हमारे बच्चे

संयुक्त परिवार का जन्म ही सुरक्षा के लिए हुआ था, और यह तब तक चला जब तक अर्थव्यवस्था कृषि;आधारित थी। वर्तमान में लोगों ने रोजगार की तलाश में गांव से शहर ,प्रांत से दूसरे प्रांत देश से विदेश पलायन करने लगे हैं। जब तक परिवार संयुक्त थे बच्चों का लालन पालन भी संयुक्त था। अगर बच्चे के माता पिता किसी काम में लगे रहते थे तो परिवार के अन्य सदस्य बच्चे पर निगाह रखते थे।
 

संयुक्त परिवारों की भूमिका
 

अब लोगों ने रोजगार की तलाश में पलायन शुरू;कर दिया है। ऐसे में बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी का भार भी केवल उनके मां बाप के ऊपर आ गया। वहीं मौजूदा अर्थव्यवस्था के कारण आज माता पिता दोनो का कमाना आवश्यक;हो गया है। 

ऐसे में संयुक्त परिवारों की भूमिका और आवश्यक;हो गयी है। जाहिर है संयुक्त परिवार बच्चे के पालन पोशण को अपना फर्ज मानकर करता है। एक ओर जहां दादा -दादी अथवा नाना-नानी बच्चे को शिक्षा;के साथ-साथ पारिवारिक पंरम्पराओं से परिचित करते है तो अन्य सदस्य उसका प्यार से लालन पालन करते हैं।

एकल परिवारों मे रहने वाले अभिवावकों को समय निकालकर बच्चों को लेकर अपने रिश्तेदारों;खासतौर से दादा-दादी और नाना-नानी से मिलवाने जरूर जाना चाहिए। कभी-कभी बच्चों के दादी-दादी अथवा नाना -नानीको अपने घर पर भी रहने के लिए बुलाना चाहिए। संयुक्त परिवारों में पलने वाले बच्चे अपने हम उम्र बच्चों के साथ रहना अपने खिलौने तथा खाने पीने की वस्तुएं साझां करने के साथ-साथ उनमें टीम भावना का भी विकास होता है।
 

संयुक्त परिवार के लाभ
 

1- दादा-दादी अथवा नाना-नानी महत्वपूर्ण शिक्षक

अकसर देखा गया है कि अपनी उम्र के अनुभवों के कारण वृद्ध जन बच्चों से अच्छा तालमेल बैठा लेते और चुटकियों में अच्छी सीख दे देते हैं। दादा-दादी के पास जीवन का लम्बा अनुभव होता है ,वे बच्चों के अच्छे गुरू बन सकतें है। उनके द्वारा दी गयी शिक्षा;बच्चे के पूरे जीवन काम आने वाली होगी । उनको जीवन के मूल्यों को समक्ष व सीख देने वाली षिक्षा केवल दादा-दादी द्वारा ही दी जा सकती है।
 

2- सहचर और आदर करने की शिक्षा

संयुक्त परिवार में पलने वाले बच्चे चीजों को एक दूसरे के साथ साझा करने तथा परस्पर सम्मान करना सीखते हैं। संयुक्त परिवारों अधिकतर दादा-दादी समेत अन्य बड़े भी मौजूद होने के कारण परिवारिक तथा समाजिक संस्कारों का खास ध्यान रखा जाता है। ऐसे परिवारों में पलने वाले बच्चे आमतौर से सभ्य होते हैं।
 

3- दूसरे के अनुभवों से सीख

परिवार के अन्य बुजर्गो के पास जीवन का अपार अनुभव होता है। इन अनुभवों का लाभ बच्चों को मिलता है। बुजर्गों के अनुभवों से बच्चों के आगे का जीवन आसान होता है। बच्चों को स्कूली शिक्षा;में भी मदद मिलती है।
 

4-सुरक्षा

यदि माता-पिता दोनो प्रोफेशनल है और काम करने बाहर जाते हैं ,तो उनके दिमाग में अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है। संयुक्त परिवार में रहने वालों को यह चिंता बिल्कुल नहीं रहती है। उनके पीछे उनके बच्चों की देखभाल करने वाले मौजूद रहते हैं। आजकल आये दिन खबरें आ रही है कि बच्चे ब्लू व्हेल खेल से प्रभावित होकर अपने को खतरे में ड़ाल रहें यदि ऐसे बच्चों का लालन पालन संयुक्त परिवारों में हों;तो इस समस्या से निजात मिल सकती है।
 

5-अनुभवों का लाभ

बच्चों को बुजर्गो के अनुभवों का लाभ मिलता है। ये ऐसा लाभ होता है जो पुस्तकों में कहीं और से नहीं मिल सकता है। दरअसल दादा-दादी अनुभवों का खजाना होते हैं, उसका लाभ बच्चों को मिलता है। अकसर अभिवावक शिकायत;करते मिल जाते हैं कि उनका बच्चा कार्टून बहुत देखता है। सवाल;यह है कि माता-पिता को अपने कामों से फुर्सत नहीं की वे बच्चे से बातचीत कर सकें । ऐसे में यदि घर पर दादा-दादी अथवा नाना-नानी मौजूद रहेगें तो वे बच्चों को अपने अनुभवों और भारत की पांरम्परिक कहानियों की ऐसी विरासत सौंप देगें कि जिसके बाद बच्चा कार्टून की तरफ कम ही रूख करेगा।
 

6-अपनी विरासत से जुड़ाव

बच्चे जब अपना समय दादा-दादी अथवा नाना-नानी के साथ बिताते हैं तो उनका साक्षात्कार अपनी परम्परा से होता है। अकसर मांताएं शिकायत;करती नजर आती हैं कि उनका बच्चा ये नहीं खाता या कोई खास खाना ही खाना पंसद करता है। भले वह खाना उसकी सेहत के लिए हानिकारक ही क्यों न हो। अजकल बच्चों की खानपान आदतों पर टी.वी. पर आने वाले विज्ञापनो का भी खासा असर रहता है। ऐसे यदि बच्चों की परवरिश दादा-दादी या नाना-नानी की देख रेख में होती है ,तो वे उसकी सेहत को ध्यान में रखकर ही खाना खाने के लिए अपने अनुभवों के आधार पर प्रेरित करेगें।

 

 

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