Health and Wellness

बच्चों के रोने के पीछे हैं वैज्ञानिक कारण, समझिये Arsenic Hours को

Parentune Support
All age groups

Created by Parentune Support
Updated on Mar 22, 2018

बच्चों के रोने के पीछे हैं वैज्ञानिक कारण समझिये Arsenic Hours को

क्या हैं Arsenic Hours

पहले बारह हफ़्तों में सभी बच्चे समय-समय पर रोते हैं जैसे उनमें रोने का कोई अलार्म लगा हुआ हो. आमतौर पर ऐसा दिन के किसी ख़ास समय ही होता है, जब छोटे बच्चे ज़्यादा रोते हैं. ये समय एक घंटे से लेकर पांच घंटे तक का हो सकता है. इस समय को ‘arsenic hours’ कहा जाता है.
 

क्या है कारण

ढाई से तीन महीने के होने पर बच्चे इस तरह का बर्ताव करना शुरू करते हैं. 12 हफ़्तों के होते-होते ये रोना अपने आप कम होने लगता है. ऐसा क्यों होता है, इसका कारण ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है लेकिन ऐसा माना जाता है कि ये तंत्रिका तंत्र के अतिसक्रिय हो जाने से होता है.
 

क्या करें, क्या न करें
 

  • इस स्थिति में आपको एक बात ज़रूर ध्यान रखनी चाहिये कि आपको धैर्य रखना होगा. बच्चे के रोने पर या चुपाने पर शांत न होने पर आपको झल्लाना नहीं चाहिए.
     
  • उनका इस समय रोना, चिढ़चिड़ा हो जाना, चिल्लाना, हाथ-पैर पटकना आदि सब सामान्य है, ये समझने के बाद आपको कम झल्लाहट होगी.
     
  • कई लोग मानते हैं कि इस दौरान बच्चे को ज़्यादा लाड-प्यार करने से उनकी आदत बिगड़ जाती है लेकिन ये एक मिथक है. बल्कि, इस दौरान उन्हें दुलार की ज़्यादा ज़रूरत होती है. ऐसा न सोचें कि इससे बच्चा बिगड़ जायेगा और अगर उसे इसकी आदत पड़ भी जाती है तो उसे आप बाद में आसानी से बदल सकते हैं.
     

अपने बच्चे को समझिये
 

  • आपको ये ख़ुद पता लगाना होगा कि क्या करने से आपका बच्चा शांत होता है. सभी बच्चों को शांत कराने का तरीका अलग होता है. अगर कुछ भी करने से वो शांत न हो तो आप उसे रो लेने दें. बड़ों की ही तरह बच्चों में भी रोने से तनाव कम होता है.
     
  • रोना एक तरह से बच्चे का पहला पहला कम्युनिकेशन होता है. इसे रोकना बिलकुल आवश्यक नहीं होता. वो इसी तरह ख़ुद को ज़ाहिर कर रहे होते हैं. इसे आपको अपनाना चाहिए और बच्चे को संभालना चाहिए. लेकिन अगर बच्चे का रोना हद से ज़्यादा बढ़ जाये तो आपको उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए.
     
  • आम तौर पर ऐसे में बच्चे के पास रहने से उसे राहत मिलती है. सहलाने से भी बच्चे बेहतर महसूस करते हैं. इससे उन्हें सुरक्षित महसूस होता है. झूला झुलाने से भी कई बच्चों को अच्छा लगता है, वहीँ कुछ बच्चे चाहते हैं कि उन्हें गोद में लेकर टहला जाये.
     

इन बातों का रखें ध्यान

 

  • ऐसा होने पर बच्चे को खुली हवा में गोद में लेकर टहलें. वातावरण बदलने से बच्चे अच्छा महसूस करते हैं. उसे लोरी सुना कर भी आप अपने होने का एहसास करा सकते हैं. ये बिलकुल मायने नहीं रखता कि आप कितना अच्छा या बुरा गाते हैं. बस उन्हें शोर से बचाएं, क्योंकि शोर से भी बच्चे परेशान होते हैं.
     
  • कई बच्चे दूध पिलान से चुप हो जाते हैं. बच्चों को दूध पिलाने की कोशिश करें. उन्हें गोद में लेटा कर हल्के-हल्के थपथपाएं. इस दौरान बच्चे की मालिश कभी न करें, ये आपको तब ही करना चाहिए जब वो ख़ुश और रिलैक्स्ड हो.
     
  • इस दौरान आपको टीवी या रेडियो भी बंद कर देना चाहिए. उसे अलग-अलग लोगों के हाथ में देना, कमरे में ज़्यादा रौशनी होना, उसे और परेशान कर सकता है.
     
  • Arsenic hours माता-पिता के लिए भी मुश्किल समय होता है, इसलिए आपको धैर्य रखना चाहिए. समय के साथ ये अपने-आप ठीक हो जाता है.

 

  • Comment
Comments()
Kindly Login or Register to post a comment.
+ START A BLOG
Top Health and Wellness Blogs
Loading
Heading

Some custom error

Heading

Some custom error