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क्यों सबसे महत्वपूर्ण होता है गर्भाधान संस्कार

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Updated on Oct 24, 2017

क्यों सबसे महत्वपूर्ण होता है गर्भाधान संस्कार

सनातन धर्म में वर्णित 16 संस्कारों में सबका अपना अलग महत्व है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण गर्भाधान संस्कार को माना गया है। यह पहला संस्कार है। गृहस्थ जिंदगी में आने के बाद पहले कर्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का मुख्य मकसद श्रेष्ठ संतान की उत्पति है। श्रेष्ठ संतान की उत्पति के लिए कुछ नियम कायदे बनाए गए हैं, जिन्हें हिंदू धर्म ग्रंथों में देखा जा सकता है। इन्हीं नियमों का पालन करते हुए विधिनुसार संतानोत्पति के लिए आवश्यक कर्म करना ही गर्भाधान संस्कार है।


क्यों है इतना महत्व

माना जाता है कि पुरुष व स्त्री का मिलन होते ही स्त्री के गर्भ में जीव अपना स्थान ग्रहण कर लेता है। उस जीव में पूर्व जन्म के विकार के अलावा गर्भ स्थापन के बाद भी कई तरह के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते हैं, इन सबको दूर करने के लिए भी इस संस्कार को किया जाता है।

  1. माता-पिता की ओर से खाए अन्न व विचारों का भी गर्भस्थ शिशु पर असर पड़ता है। माता-पिता के रज-वीर्य के दोषपूर्ण होने के कारण, उनका मादक द्रव्यों का सेवन करने, अशुद्ध खानपान, उनकी दूषित मानसिकता का भी पेट में पल रहे बच्चे पर असर पड़ता है और बच्चे में विकार आते हैं। इसे दूर करने के लिए भी गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। इससे जन्म लेने वाला शिशु दिव्य गुणों से संपन्न बनता है।
  2. स्मृतिसंग्रह में गर्भाधान के बारे में बताया गया है कि....विधि विधान से गर्भाधान करने से अच्छी व सुयोग्य संतान जन्म लेती है। इससे गर्भ भी सुरक्षित रहता है।
  3. पर्याप्त खोजों के बाद चिकित्साशास्त्र भी इस नतीजे पर पहुंचा है कि गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। यानी उस रज-वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के भाव खुद ही आ जाते हैं।


कब करें गर्भाधान

शास्त्रों में भी इस संस्कार को लेकर लिखा गया है कि माता-पिता को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि गर्भाधान संस्कार शुभ मुहुर्त में हो।

ज्योतिष शास्त्री बताते हैं कि गर्भाधान के लिए उत्तम तिथि होती है मासिक धर्म के पश्चात चतुर्थ व सोलहवीं तिथि। इसके अलावा षष्ठी, अष्टमी, नवमी, दशमी, द्वादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावस्या की रात्रि गर्भ धारण के लिए अनुकूल मानी जाती है।

गर्भाधान संस्कार के लिए उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा, हस्त, स्वाती, श्रवण, घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र बहुत ही शुभ और उत्तम माने गए हैं।

ज्योतिष शास्त्र में गर्भाधान संस्कार हेतु प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, द्वादशी व त्रयोदशी तिथि को बहुत शुभ माना गया है।

गर्भाधान के लिए सबसे अच्छा वार है बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार। इसके अलावा सोमवार भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे मध्यम माना गया है।

गर्भाधान कब न करें

शास्त्रों के अनुसार मलिन अवस्था में, मासिक धर्म के समय, सुबह व शाम के समय गर्भाधान संस्कार नहीं करना चाहिए।

मन में यदि चिंता, भय, क्रोध व अन्य मनोविकार हो, तो उस अवस्था में भी गर्भाधान नहीं करना चाहिए।

इसके अलावा श्राद्ध के दिनों में, धार्मिक पर्वों में व प्रदोष काल में भी गर्भाधान संस्कार को गलत माना गया है। मान्यता है कि इन सब स्थितियों में गर्भाधान संस्कार करने से दुराचारी संतान पैदा होती है।

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