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अपने बच्चे को इन महान शहीदों की गाथा के बारे में जरुर बताएं

Neha Bhardwaj
3 से 7 वर्ष

Neha Bhardwaj के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Aug 13, 2018

अपने बच्चे को इन महान शहीदों की गाथा के बारे में जरुर बताएं

15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ था। हर साल हम लोग 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। इस मौके पर हमें उन शहीदों को भी श्रद्धांजलि देना चाहिए जो गुमनाम होकर रह गए। इस ब्लॉग में हम उन्हीं शहीदों की कुर्बानी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

इन महान शहीदों की कहानी अपने बच्चे को जरूर सुनाएं / Tell Your Child The Story Of These Great Martyrs In Hindi

बच्चे ही आने वाले कल के भविष्य हैं तो इसलिए हमें अपने बच्चे को भी महान शहीदों की गाथा के बारे में जरूर बताना चाहिए। 

  1.  लाला लाजपत राय बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में लाला जी ने हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में वे बुरी तरह से घायल हो गये। उस समय इन्होंने कहा था: "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।" और वही हुआ भी इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया।
     
  2. लाला जी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य जांबाज देशभक्तों ने ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स की हत्या कर दी , इसी मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी की सज़ा सुनाई गई।
     
  3.  चन्द्रशेखर आज़ाद  इन्होंने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों (भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु) की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। इसी सिलसिले में अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहां आ पहुंचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में 27 फरवरी 1931 को आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया जैसे ही आजाद के बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड़ पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में , शीशियों में भरकर ले जाने लगे। अगले दिन आजाद की अस्थियां चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा।
     
  4.  भगत सिंह  23 मार्च 1931 को सायंकाल सुखदेव थापर, शिवराम हरि राजगुरु तीनों को लाहौर सेण्ट्रल जेल में फांसी पर जाने से पहले जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि लेनिन की जीवनी जिसे वह पढ़ रहे थे पूरा करने का समय दिया जाए। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेज इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंक कर भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया जिसके साथ ही भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव हमेशा के लिये अमर हो गये।
     
  5.  रामप्रसाद बिस्मिल  उनको काकोरी ट्रेन डकैती में दोषी पाया गया था जिसके लिए उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी । 16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। 18 दिसम्बर को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसम्बर को प्रात:काल गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी। जेल का मुख्य द्वार बन्द ही रखा गया और फांसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। शव को डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया । स्वदेश' में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार उनकी माता ने कहा था - 'मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुःखी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा ही पुत्र चाहती थी। वैसा ही मेरा 'राम' था।
     
  6.  भाई बालमुकुन्द  भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे। सन 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक में हुए लॉर्ड हार्डिग बम कांड में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवध बिहारी को 8 मई 1915 को ही फांसी पर लटका दिया गया, जबकि अगले दिन यानी 9 मई को अंबाला में वसंत कुमार विश्वास को फांसी दी गई। वे महान क्रान्तिकारी भाई परमानन्द के चचेरे भाई थे। हालांकि इनके खिलाफ जुर्म साबित नहीं हुआ, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने शक के आधार पर इन्हें फांसी की सजा सुना दी। भाई बालमुकुंद का विवाह एक साल पहले ही हुआ था। उनकी पत्नी रामरखी की इच्छा थी कि भाई बालमुकुंद का शव उन्हें सौंप दिया जाए, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उन्हें शव नहीं दिया। उसी दिन से रामरखी ने भोजन व पानी त्याग दिया और अठारहवें दिन उनकी भी मृत्यु हो गई।
     
  7.  अमीर चंद जी  उनका जन्म हैदराबाद की विधानसभा के सेक्रेटरी के घर हुआ था। उनके मन में देश भक्ति की मान्यता इतनी प्रबल थी कि वे स्वदेशी आंदोलन के दौरान हैदराबाद के बाजार में अपने स्वदेशी स्टोर में देशभक्तों की तस्वीरें तथा क्रांतिकारी साहित्य बेचते थे। दिल्ली में उस समय के वायसरॉय लार्ड हार्डिग पर बम फेंकने की घटना में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1915 में उन्हें तीन साथियों (अवध बिहारी, बाल मुकुंद, बसन्त कुमार बिस्वास) के साथ दिल्ली केंद्रीय जेल में फांसी दे दी गई।
     
  8.  श्री बसंत कुमार बिस्वास  बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन " युगांतर " के सदस्य थे। उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय लोर्ड होर्डिंग पर बम फेंका था और इस के फलस्वरूप उन पर दिल्ली षड्यंत्र केस" या "दिल्ली-लाहोर षड्यंत्र केस" चलाया गया। बसंत को आजीवन कारावास की सजा हुई किन्तु दुष्ट अंग्रेज सरकार तो उन्हें फांसी देना चाहता था इसीलिए अंग्रेजों ने लाहौर हाईकोर्ट में अपील की और अंततः बसंत बिस्वास को बाल मुकुंद, अवध बिहारी व मास्टर अमीर चंद के साथ फांसी की सजा दी गयी। पंजाब की अम्बाला सेंट्रल जेल में इस युवा स्वतंत्रता सेनानी को मात्र 20 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गयी। स्वतंत्रता संग्राम के दोरान अत्यधिक छोटी उम्र में शहीद होने वालों में से बसंत बिस्वास भी एक हैं।
     
  9. विष्णु पिंगले  उनका जन्म पूना के तलेगांव में हुआ। वह इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने अमेरिका पहुंचे। देश में गदर पैदा करके देश को स्वतंत्र करवाने का सुनहरा मौका देखकर विष्णु , बाकी साथियों के साथ भारत लौटे और ब्रिटिश इंडिया की फौजों में क्रांति लाने की तैयारी में जुट गये। दुर्भाग्यवश विष्णु पिंगले को नादिर खान नामक एक व्यक्ति ने गिरफ्तार करवा दिया। गिरफ्तारी के समय उनके पास दस बम थे। उन पर मुकदमा चलाया गया और 17 नवम्बर 1915 को सेंट्रल जेल लाहौर में मात्र 27 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी दे दी गयी।
     
  10.  प्रफुल्ल चाकी जिन्होंने (खुदीराम बोस के साथ मिलकर) किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। लेकिन जिस बग्घी पर बम फेंका गया था उस पर किंग्सफोर्ड नहीं था बल्कि बग्घी पर दो यूरोपियन महिलाएं सवार थीं। वे दोनों इस हमले में मारी गईं। दोनों क्रांतिकारियों ने समझ लिया कि वे किंग्सफोर्ड को मारने में सफल हो गए हैं। वे दोनों घटनास्थल से भाग निकले। परन्तु जब प्रफुल्ल ने देखा कि वे चारों ओर से घिर गए हैं तो उन्होंने अपनी रिवाल्वर से अपने ऊपर गोली चलाकर अपनी जान दे दी। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है।
     
  11.  खुदीराम बोस  उनको प्रफुल्ल चाकी की गिरफ्तारी के अगले दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 11 अगस्त 1908 को भगवद्गीता हाथ में लेकर खुदीराम बोस धैर्य के साथ खुशी-खुशी फाँसी चढ गये। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे नौजवानों के लिए एक ख़ास किस्म की धोती, जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था , बुनने लगे । ये तो एक झलक मात्र है..जाने कितने ही रहस्य होंगे जो इतिहास के पन्नों में दबे होंगे । हमने आजादी की क्रांति में तो कोई भूमिका नही निभाई , लेकिन हम अपनी आने वाली पीढ़ी को तो इसके गौरव इतिहास के बारे में बता तो सकते ही हैं । 

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  • 1
कमैंट्स()
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| Aug 14, 2018

बहुत बढ़िया।

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