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स्वास्थ्य

ब्लैक फंगस (Black Fungus) के क्या हैं लक्षण व बचाव के उपाय?

Prasoon Pankaj
गर्भावस्था

Prasoon Pankaj के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया May 17, 2021

ब्लैक फंगस Black Fungus के क्या हैं लक्षण व बचाव के उपाय
विशेषज्ञ पैनल द्वारा सत्यापित

कोरोना वायरस की दूसरी लहर से देश पूरी तरह से संभला भी नहीं है और कोरोना के कई मरीजों में फंगल इन्फेक्शन के मामले भी लगातार बढने की खबरें आ रही है। इस इंफेक्शन को ब्लैक फंगल इन्फेक्शन के नाम से भी जाना जाता है। इस इंफेक्शन के चलते कुछ मरीजों की आंखों की रोशनी तक चले जाने का भी डर बना रहता है। ब्लैक फंगस इन्फेक्शन (Black Fungus Infection) के लक्षण और एक्सपर्ट्स के द्वारा बताए जा रहे बचाव के उपायों का अगर सही से पालन किया जाए तो बहुत हद तक इसके खतरे को कम किया जा सकता है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने अपने ट्वीट के माध्यम से जानकारी देते हुए कहा है कि "म्यूकोर्माइकोसिस या ब्लैक फंगस के मामलों को कोविड-19 के मरीजों में हाल में देखा गया है। जागरूकता और समय रहते इसका निदान इस फंगल संक्रमण से बचाव में मदद कर सकता है। ब्लैक फंगस एक दुर्लभ, मगर गंभीर स्थिति होती है, जिसे कोरोना वायरस से ग्रस्त मरीजों में देखा जा रहा है।"   

 क्या है म्यूकोर्माइकोसिस? 

म्यूकोर्माइकोसिस एक फंगल संक्रमण है, जो मुख्य रूप से उन लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, जो पहले से डायबिटीज जैसी किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हैं। यह संक्रमण वातावरण में मौजूद रोगजनकों के खिलाफ लड़ने की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है। वातावरण में मौजूद फंगल बीजाणुओं के संपर्क में आने से लोग म्यूकोर्माइकोसिस का शिकार बनते हैं। किसी घाव के जरिये भी यह शरीर में प्रवेश कर सकता है, और संक्रमण का कारण बन सकता है। म्यूकरमायकोसिस एक बेहद दुर्लभ संक्रमण है. ये म्यूकर फफूंद के कारण होता है जो आमतौर पर मिट्टी, पौधों, खाद, सड़े हुए फल और सब्ज़ियों में पनपता है.

मरीजों को कैसे चपेट में लेता है संक्रमण?

 ये जानना बहुत आवश्यक है कि पहले से किसी प्रकार के गंभीर रोग, अनियंत्रित डायबिटीज, स्टेरॉयड्स से प्रतिरक्षा दमन, वैरिकोनाजोल थेरैपी और लंबे समय तक आईसीयू में रहने वाले लोगों में फंगल संक्रमण की आशंका अधिक होती है। डॉक्टरों के मुताबिक ये फंगस हर जगह होती है. मिट्टी में और हवा में. यहां तक कि स्वस्थ इंसान की नाक और बलगम में भी ये फंगस पाई जाती है। ये फंगस साइनस, दिमाग़ और फेफड़ों को प्रभावित करती है और डायबिटीज़ के मरीज़ों या बेहद कमज़ोर इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) वाले लोगों जैसे कैंसर या एचआईवी/एड्स के मरीज़ों में ये जानलेवा भी हो सकती है.

 म्यूकोर्माइकोसिस यानि ब्लैक फंगस के लक्षण क्या हैं?

  •  आंखों के आसपास दर्द और लाल रंग, बुखार

  •  सिरदर्द, खांसी, तेज सांस चलना

  •  खूनी उल्टी

  •  परिवर्तित मानसिक स्थिति संक्रमण के संभावित लक्षण हो सकते हैं।

  • चेहरे पर दर्द

  • नाक बंद

  • आंखों की रोशनी कम होना या फिर दर्द होना

  • भ्रम पैदा होना

  • गाल और आंखों में सूजन

  • दांत दर्द

  • दांतों का ढीला होना

  • नाक में काली पपड़ी बनना

कोविड मरीज काले फंगस से बचने के लिए क्या करें और क्या नहीं

  • ब्लैक फंगस के संकेत और लक्षणों को नोटिस करें और तत्काल डॉक्टर या नजदीकी अस्पताल से संपर्क करें। 

  • हाइपरग्लाइसीमिया को कंट्रोल करें

  • कोरोना से निजात पाने के बाद भी अपना ब्लड शुगर चेक करते रहें। खासकर डायबिटीज के मरीज। 

  • स्टेरॉयड का उपयोग सही तरीके से और अपने चिकित्सक के परामर्श से ही करें - सही समय, सही खुराक और अवधि का ध्यान रखना बहुत जरूरी है

  •  एंटीबायोटिक/एंटीफंगल का प्रयोग भी ठीक ढंग से सोच-समझकर करे। 

  • एक्सपर्ट्स के मुताबिक कोरोना के मरीजो का जब ऑक्सीजनेशन कम होता है, सांस लेने में दिक्कत होती है, सेचुरेशन 94 से कम होता है, 7 दिन के बाद भी बुखार रहता है, ऐसी कंडीशन में स्टेरॉइड इस्तेमाल होते हैं। हर कोविड पॉजिटिव को स्टेरॉइड नहीं दिए जाते हैं। कोविड में स्टेरॉइड के ओवर यूज से ब्लैक फंगस हो सकता है। 

  • जो लोग लंबे समय तक स्टेरॉयड और नमी वाले ऑक्सीजन पर और पहले से मौजूद कॉम्बिडिटी वाले कोविड रोगियों को सबसे अधिक खतरा है।  इसके अलावा उन मरीजों को भी खतरा है जो लोग कीमोथेरेपी और इम्यूनिटी से संबंधित दवाएं ले रहे हैं।

  • डॉक्टर्स बताते हैं कि अधिकतर मरीज़ उनके पास देर से आते हैं, तब तक ये संक्रमण घातक हो चुका होता है और उनकी आंखों की रोशनी जा चुकी होती है. ऐसे में डॉक्टर्स को संक्रमण को दिमाग़ तक पहुंचने से रोकने के लिए उनकी आंख निकालनी पड़ती है.

  • कुछ मामलों में मरीज़ों की दोनों आंखों की रोशनी चली जाती है. कुछ दुर्लभ मामलों में डॉक्टरों को मरीज़ का जबड़ा भी निकालना पड़ता है ताकि संक्रमण को और फैलने से रोका जा सके.

आईसीएमआर ने जारी की एडवाइज़री

आईसीएमआर ने म्यूकरमायकोसिस की टेस्टिंग और इलाज के लिए एक एडवाइज़री जारी की है और कहा है कि यदि इसे नज़रअंदाज़ किया तो ये जानलेवा भी हो सकता है.

  • एडवाइज़री में कहा गया है कि ये एक तरह की फंगस या फफूंद है जो उन लोगों पर हमला करता है जो किसी स्वास्थ्य समस्या के कारण दवाएं ले रहे हैं और इस कारण बीमारी से लड़ने के लिए उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम हो गई है.

  • म्यूकरमायकोसिस के लक्षण- व्यक्ति को आंखों और नाक में दर्द होने, उसके आसपास की जगह लाल होने, बुख़ार, सिरदर्द, खांसी और सांस लेने में दिक्कत आ सकती है. संक्रमित व्यक्ति को ख़ून की उल्टियां भी हो सकती हैं.

ब्लैक फंगस से बचाव के लिए क्या हैं उपाय

आईसीएमआर की एडवायज़री के अनुसार इससे बचने के लिए धूल भरी जगह पर जाने से पहले मास्क ज़रूर लगाएं. जूते, शरीर को पूरी तरह ढकने वाले कपड़े पहनें, मिट्टी या खाद का काम करने से पहले हाथों में ग्लव्स पहनें और घिस कर नहाने जैसे पर्सनल हाइजीन का पालन करें.

  • आईसीएमआर के अनुसार अगर कोई म्यूकरमायकोसिस संक्रमित हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए और अगर व्यक्ति कोविड-19 से ठीक हो गया है तब भी लगातार ब्लड शुगर की जांच करते रहें.
  • ऑक्सीजन ले रहे हों तो ह्यूमीडिफ़ायर के लिए साफ पानी (स्टेराइल वॉटर) का इस्तेंमाल करें. एंटीबायोटिक्स, एंटीफंगल दवा और स्टरॉयड का इस्तेमाल बिना डॉक्टर की सलाह के न करें.

एम्स ऋषिकेश के विशेषज्ञों का कहना है कि शुगर से पीड़ित और स्टेरॉयड ज्यादा लेने वाले मरीजों में ब्लैक फंगस का ज्यादा खतरा है। इससे बचने के लिये शुगर नियंत्रित रखनी चाहिए। स्टेरॉयड के अलावा कोरोना की कुछ दवाएं भी मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर डालती हैं। खासकर कोरोना से उबरे लोगों को लक्षण पर निगरानी रखनी होगी। लक्षण मिलते ही इलाज शुरू होने पर बीमारी से बचाव संभव है। एम्स ऋषिकेश के निदेशक प्रोफेसर रविकांत के मुताबिक अनियंत्रित डायबिटीज और स्टेरॉयड के अधिक इस्तेमाल से कमजोर इम्युनिटी वालों और लंबे समय तक आईसीयू में रहने वालों पर ब्लैक फंगस का ज्यादा खतरा है। किसी दूसरी बीमारी से भी फंगल का खतरा बढ़ जाता है। फंगल एटियोलॉजी का पता लगाने के लिये केओएच टेस्ट और माइक्रोस्कोपी की मदद लेने से घबराएं नहीं। तुंरत इलाज शुरू होने पर रोग से निजात मिल जाती है। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। मौजूदा वक्त में बीमारी से निपटने के लिये सुरक्षित सिस्टम नहीं है। सतर्कता ही बचाव का एकमात्र उपाय है। बीमारी से मस्तिष्क, फेफड़े और त्वचा पर इसका असर देखने को मिला है।

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इस ब्लॉग को पेरेंट्यून विशेषज्ञ पैनल के डॉक्टरों और विशेषज्ञों द्वारा जांचा और सत्यापित किया गया है। हमारे पैनल में निओनेटोलाजिस्ट, गायनोकोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन, न्यूट्रिशनिस्ट, चाइल्ड काउंसलर, एजुकेशन एंड लर्निंग एक्सपर्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, लर्निंग डिसेबिलिटी एक्सपर्ट और डेवलपमेंटल पीड शामिल हैं।

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