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अपने बच्चों में जगाएँ दिव्यांगों के प्रति समानता का भाव

अपने बच्चों में जगाएँ दिव्यांगों के प्रति समानता का भाव

Published: 18/01/26

Updated: 18/01/26

समाज के एक जागरूक सदस्य के रूप में आपको भी अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए तथा  अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही ऐसे संस्कार देने चाहिए जिससे वे आगे चलकर दिव्यांगों के साथ सम्मान के भाव से व्यवहार कर सकें। बच्चे को यह शिक्षा दें कि किसी दिव्यांग का मूल्यांकन उसकी शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी सोच, उसकी बुद्धिमत्ता, उसके विवेक और उसके साहस से होनी चाहिए। इसलिए व्यक्ति के शारीरिक सौंदर्य या उसकी आकर्षक शारीरिक बनावट या रंग-रूप को महत्व न देकर उसके ज्ञान, विवेक, हिम्मत और उसके कौशल के आधार पर उसकी महानता देखनी चाहिए।

दो वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांग के स्थान पर दिव्यांग शब्द का प्रयोग करने की घोषणा की थी। ऐसा करने का मकसद यह था कि दिव्यांगों के आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सके और उनके प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव लाया जा सके। ज्यादातर लोग दिव्यांगों के प्रति अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं। उनका यह व्यवहार व सोच गलत है। एक अच्छे नागरिक का कर्तव्य है कि वह जैसा व्यवहार अपने स्वस्थ परिजनों से करते हैं, वैसा ही व्यवहार दिव्यांगों से किया जाना चाहिए।
 

बच्चे को सिखाएं दिव्यांगों का सम्मान करना  

  • आपको अपने बच्चों को बताना चाहिए कि उन्हे अपने आस-पास के दिव्यांग व्यक्तियों का उसी प्रकार से सम्मान करना चाहिए जैसे वे सामान्य व्यक्तियों का करते हैं। प्रायः देखा गया है कि बहुत से बच्चे शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के साथ शरारतपूर्ण हरकतें करते हैं। कभी-कभी बच्चे दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अंधा, लंगड़ा जैसे अप्रिय शब्दों का प्रयोग कर देते हैं। उनकी इस शरारत से दिव्यांग व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक चोट पहुँच सकती है। यदि आपका बच्चा भी ऐसा ही करता है तो उसे तत्काल रोकें और तत्काल बच्चे को अपराध बोध कराते हुए उस व्यक्ति से माफी माँगने को कहें और भविष्य में ऐसा न करने की हिदायत भी दें।
     
  • अगर आपके घर में या पास- पड़ोस में कोई दिव्यांग व्यक्ति है तो उसके पास भी अपने बच्चों को खुलकर खेलने दें। इससे एक ओर तो उस व्यक्ति को अच्छा लगेगा व दूसरी ओर बच्चे के मन में भी समाज के अन्य दिव्यांग व्यक्ति के प्रति प्रेमभाव पैदा होगा। आप को स्वयं ही अपने बच्चे के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए तथा दिव्यांग व्यक्ति के साथ कुछ समय अवश्य व्यतीत करना चाहिए। बच्चा वही करेगा जो आपसे सीखेगा। यदि आप व्यक्तिगत रूप से किसी दिव्यङ्ग बच्चे को जानते हैं तो ऐसे बच्चों के परिजनों से अपील करें कि वे अपने बच्चों को कभी भी बोझ न समझें और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए स्वतंत्रता के साथ जिंदगी जीने और आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करें। दिव्यांग बच्चों के साथ आम बच्चों जैसा ही व्यवहार करने और उनको सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करें।
     
  • अपने बच्चे को इस संबंध में और अधिक जागरूक बनाने के लिए आपको उसे प्रेरक फिल्में दिखानी चाहिए, क्योंकि बच्चे स्क्रीन या टेलीविज़न पर चीजों को देखकर उसका अनुसरण करने की कोशिश करते हैं। आपको बच्चों को खाली समय में प्रेरक कहानियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें अनेक ऐसे लोगों की मिसाल दें जिन्होंने अपंगता की परवाह न करते हुए किसी न किसी क्षेत्र में अपना मुकाम हासिल किया। अष्टावक्र ऋषि या स्टीफेन हाकिन्स का जीवन, हमें एक महान सन्देश देता है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की "कमज़ोरी नहीं बल्कि उसकी विशेषता” हो सकती है।  
     
  •  बच्चों को बताएं कि दिव्यांग भी किसी से कम नहीं है। यदि उनका सही मार्ग दर्शन किया जाए तो वह भी जिंदगी के हर मुकाम को हासिल कर सकते हैं। एक स्वस्थ- सम्पन्न समाज एक लिए जरूरी है दिव्यांगों को सहानुभूति अथवा तरस के आधार पर न देखा जाए बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए अधिक से अधिक अवसर मुहैया करवाए जाएं।
     
  • हमें अपने बच्चों को समझाना होगा कि दिव्यांग व्यक्ति भी समाज के अंग हैं और इनके साथ उपेक्षित व्यवहार करने से उनके उत्साह में कमी आती है। लिहाजा दिव्यांग व्यक्तियों के सहयोग के लिए  समाज के हर व्यक्ति को सहयोग देना होगा तभी दिव्यांग भी आम लोगों की तरह बेहतर जीवन जी सकेंगे।
     
  • नई पीढ़ी की सोच को सुधारते हुए हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जो पूरी तरह संवेदनशील हो और जहां समरसता का प्रवाह हो। एक ऐसा समाज, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सशक्त महसूस कर सके। एक ऐसा समाज जहां किसी एक का दर्द या पीड़ा, सबको समान रूप से महसूस हो। यह संवेदनशीलता एवं अपनापन, देश और समाज को और मजबूत बनायेगा। हमारा यही दृष्टिकोण, दिव्यांगों की वास्तविक प्रतिभा को सामने लाने में सहायक सिद्ध होगा। 

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