धोक पड़वा पर्व की अनूठी परंपरा ...
धोक पड़वा पर्व की अनूठी परंपरा के बारे में अपने बच्चे को जरूर बताएं
Published: 10/11/23
Updated: 10/11/23
अनेक प्रकार की संस्कृतियों व अनूठी परंपराओं से समृद्ध माना जाता है अपना देश भारत। पर्व त्योहारों के रंगों की विविधताएं जो अपने देश में देखने को मिलती है वो शायद कहीं और नहीं मिल सकता है। त्योहारों के अवसर पर हम एक दूसरे के साथ खुशियां बांटते हैं अपने गिले शिकवे दूर करते हैं। प्रत्येक पर्व त्योहार को मनाए जाने के पीछे कुछ सकारात्मक संदेश छुपे होते हैं, जरूरत इस बात की भी है कि हम अपने बच्चों के साथ इन्हें जरूर साझा करें ताकि उनके अंदर भी ऐसे गुण विकसित हो सके। क्या आप जानते हैं कि एक पर्व ऐसा भी है जो बड़ों के प्रति आदर, छोटों के लिए आशीर्वाद-स्नेह और अपने आसपास रहने वालों से भाईचारा बनाए रखने का संदेश देता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के महू इलाके में सदियों से चली आ रही एक परंपरागत त्योहार धोक पड़वा के बारे में….
क्यों बताएं धोक पड़वा के बारे में अपने बच्चे को / (kyun batayen dhok padva ke baare mein apne bachhe ko)
भागमभाग वाली लाइफस्टाइल के चलते एक दूसरे से मिलने जुलने का वक्त ही नहीं मिल पाता है। सोशल मीडिया से पता चलता है कि कौन क्या कर रहा है? मध्य प्रदेश के महू में साल में एक त्योहार ऐसा भी मनाया जाता है जिसमें लोग एक दूसरे से मिलते हैं, प्रत्यक्ष आमने सामने होते हैं। अपने से बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। इस त्योहार से जुड़ी और भी खास बातों के बारे में मैं आपको इस ब्लॉग में विस्तार से बताने जा रहा हूं।
दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है धोक पड़वा त्योहार। महू में इस दिन अलग ही रौनक देखने को मिलती है। इस त्योहार को अनोखा इसलिए भी कहते हैं क्योंकि इसमें अपनों के प्रति आदर और संबल देने का रिवाज है। महू के लोग इस दिन अपनों से बड़ों से मिलने जाते हैं, उनका हालचाल जानते हैं और उन्हें ‘धोक’ देते हैं यानि उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। एक दूसरे के घर जाने का सिलसिला सुबह से लेकर देर शाम तक चलता रहता है। महू के बुजुर्ग बताते हैं कि मिलने-जुलने के लिए इसे परंपरा को पर्व का नाम दे दिया गया ताकि मेल-जोल का महत्व कम ना हो और हम नए लोगों से भी मुलाकात कर अपनेपन की भावना का इजहार कर सकें।अच्छी बात ये है कि पिछले कई पीढ़ियों से चले आ रहे इस त्योहार की परंपरा को आज की पीढ़ी ने भी बखूबी कायम कर रखा है।
इस दिन मानो पूरा शहर सड़कों पर उतर आता है और केवल कुछ ही घंटों में हजारों लोग एक दूसरे से मिल लेते हैं। शहर के वरिष्ठ नागरिक कहते है कि यह परंपरा कब से शुरू हुई यह नही मालूम लेकिन जब से हम पैदा हुए तब से ही मना रहे हैं। इस पर्व की प्राचीन परंपराओं से छोटे बच्चे चरण स्पर्श का महत्व, आशीर्वाद प्राप्ति, सामाजिक सद्भाव, सकारात्मकता का सृजन, तनाव को कम करने जैसे गुणों को भी सीखते हैं। एक ही दिन में ये पर्व तीन स्वरूप ले लेता है। सुबह के समय में युवाओं व पुरुषों की भीड़ शहर में भ्रमण कर एक दूसरे को धोक देते हुए मिलते हैं, दोपहर के बाद महिलाएं एक दूसरे से मिलने के लिए घर से निकलती हैं और शाम के बाद परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से एक दूसरे के घर जाते हैं। इस पर्व के अवसर पर शहर के हर घर के दरवाजे खुले रहते हैं तथा आने वालो का मिठाई, जलपान से स्वागत किया जाता है। महू के लोग भले विदेश में क्यों ना रहते हों लेकिन धोक पड़वा में शामिल होने के लिए वे जरूर उपस्थित होने का प्रयास करते हैं। ये कविता महू में में रहने वालों को समर्पित करते हैं, उन्हीं में से एक ने ये कविता पेरेंट्यून के साथ साझा किया है। अगर आप इस दीवाली इंदौर में हैं, दो दीवाली के अगले दिन धोक पड़वा देखने महू जरूर जाइयेगा। बहुत अपनत्व महसूस करेंगे और अगर आप महू नहीं जा सकते हैं तो अपने शहर में ही महू ले आइयेगा, इस बार धोक जरूर देकर धोक पड़वा की परंपरा अपने पड़ोसियों व दोस्तों में शेयर कर दीजिएगा।
अगर आपके शहर में भी कोई अनूठी परंपरा है तो जरूर हमारे साथ साझा कीजिएगा और हम पेरेंट्यून के सारे पेरेंट्स को उसके बारे में जरूर बताएंगे। दीवाली शुभ और मंगलमय हो।
Doctor Q&As from Parents like you
धोग पड़वा
जब धोग देने जiयi करते थे
बहुत अच्छा खाया करते थे
शुरुआत दिन की तैयारियों में
शiम साथ हो कर यारियां में
निकलते थे अपने छोटे से घरों से
टूटी हुई दीवारो और सड़कों से
उस वक्त दीवारो की दरारे नहीं दीखि
अब दिखाई पडी जब, इमारतें बदल गयीं
ईस बार जब घर पहुँचेंगे दिवाली में
फिर से अपने बचपन में जरूर जाएंगे
मिलेंगे सबसे एक साथ, धोग जरूर देने जायेंगे
दिल की बात, ईस बार दिलवाली दिवाली मनाएंगे
- मोज्जा
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