कैलोरी-निर्देश
किन बातों का ख्याल रखें बच्चे के अन्नप्राशन संस्कार की प्लानिंग करते समय?
प्रकाशित: 30 जुल॰ 2018
अपडेटेड: 22 नव॰ 2023
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हिंदू धर्म में 16 संस्कार माने गए हैं। इनमें सभी का अपना खास महत्व है। इसमें सप्तम संस्कार है अन्नप्राशन संस्कार। यह खान-पान संबंधी दोषों को दूर करने के लिए जातक के जन्म के 6-7 महीने बाद किया जाता है। अन्नप्राशन शिशु को अन्न खिलाने की शुरुआत को कहा जाता है। दरअसल 6 महीने तक बच्चा मां के दूध पर ही निर्भर रहता है, लेकिन छठे महीने के बाद अन्नप्राशन संस्कार के बाद उसे अन्न ग्रहण कराया जाता है, इसलिए इस संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर क्या है यह संस्कार, इसका महत्व क्या है और इसके लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
अन्नप्राशन संस्कार का महत्व / Importance of Annaprashan in Hindi
“अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति” इसका अर्थ है कि माता के गर्भ में रहते हुए जातक में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं उनके निदान व शिशु के सुपोषण हेतु शुद्ध भोजन करवाया जाना चाहिये। छह मास तक माता का दूध ही शिशु के लिये सबसे बेहतर भोजन होता है इसके पश्चात उसे अन्न ग्रहण करवाना चाहिये इसलिये अन्नप्राशन संस्कार((First Feeding Ceremony) ) का बहुत अधिक महत्व है। शास्त्रों में भी अन्न को ही जीवन का प्राण बताया गया है। अन्न से ही मन का निर्माण बताया जाता है इसलिये अन्न का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। कहा भी गया है कि “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि”।
कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार / Tips for Making Annaprashan Ceremony Memorable in Hindi
अन्नप्राशन संस्कार जन्म के बाद छठे या सातवें महीने में किया जाता है। दरअसल 6 महीने तक बच्चे को मां का दूध ही देने
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