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अन्नप्राशन संस्कार की प्लानिंग कर रहे हैं तो इन बातों का रखें ख्याल

Deepak Pratihast
0 से 1 वर्ष

Deepak Pratihast के द्वारा बनाई गई
संशोधित किया गया Jul 30, 2018

अन्नप्राशन संस्कार की प्लानिंग कर रहे हैं तो इन बातों का रखें ख्याल

हिंदू धर्म में 16 संस्कार माने गए हैं। इनमें सभी का अपना खास महत्व है। इसमें सप्तम संस्कार है अन्नप्राशन संस्कार। यह खान-पान संबंधी दोषों को दूर करने के लिए जातक के जन्म के 6-7 महीने बाद किया जाता है। अन्नप्राशन शिशु को अन्न खिलाने की शुरुआत को कहा जाता है। दरअसल 6 महीने तक बच्चा मां के दूध पर ही निर्भर रहता है, लेकिन छठे महीने के बाद अन्नप्राशन संस्कार के बाद उसे अन्न ग्रहण कराया जाता है, इसलिए इस संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर क्या है यह संस्कार, इसका महत्व क्या है और इसके लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।


अन्नप्राशन संस्कार का महत्व

“अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति” इसका अर्थ है कि माता के गर्भ में रहते हुए जातक में मलिन भोजन के जो दोष आते हैं उनके निदान व शिशु के सुपोषण हेतु शुद्ध भोजन करवाया जाना चाहिये। छह मास तक माता का दूध ही शिशु के लिये सबसे बेहतर भोजन होता है इसके पश्चात उसे अन्न ग्रहण करवाना चाहिये इसलिये अन्नप्राशन संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। शास्त्रों में भी अन्न को ही जीवन का प्राण बताया गया है। अन्न से ही मन का निर्माण बताया जाता है इसलिये अन्न का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। कहा भी गया है कि “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि:”।

कब करना चाहिए अन्नप्राशन संस्कार

अन्नप्राशन संस्कार जन्म के बाद छठे या सातवें महीने में किया जाता है। दरअसल 6 महीने तक बच्चे को मां का दूध ही देने चाहिए। बच्चा 7वें में महीने में जाकर हल्का भोजन पचाने में सक्षम हो जाता है, इसके अलावा इसी समय से बच्चे के दांत भी निकलने लगते हैं। ऐसे में यह संस्कार सांतवें महीने में करना चाहिए। संस्कार के लिए शुभ नक्षत्र तिथि निकलवानी चाहिए। वैसे कई जगह लड़के का अन्नप्राशन सम माह यानी जन्म के छठे या आठवें माह में किया जाता है, जबकि लड़कियों का अन्नप्राशन संस्कार विषम माह यानी जन्म के पांचवें या सातवें माह में किया जाता है। 

मंदिर या घर कहीं भी कर सकते हैं अन्नप्राशन संस्कार

इस संस्कार को लेकर कई लोग सिर्फ इसलिए कंफ्यूज रहते हैं कि आखिर इसे कहां करना चाहिए। आयोजन को लेकर हर जगह अलग-अलग मान्यता है। कोई इसे मंदिर में मनाता है तो कोई घर में ही मनाता है। विद्वानों कहते हैं कि इसे घर, मंदिर या कम्यूनिटी सेंटर कहीं भी मनाया जा सकता है। बस पैरेंट्स इसकी विधि का ठीक से पालन करें।


ऐसे किया जाता है अन्नप्राशन संस्कार

इस संस्कार के दौरान शिशु को भात, दही, शहद और घी आदि को मिलाकर खिलाया जाता है। संस्कार के लिए पंडित से शुभमुहूर्त देखकर उसमें देवताओं की पूजा करें। देवताओं की पूजा के बाद चांदी के चम्मच से खीर आदि का प्रसाद शिशु को मंत्रोच्चारण के साथ चटाएं।


इन बातों का भी रखें ध्यान

  • अन्नप्राशन संस्कार के दौरान ज्यादा भीड़ न जुटाएं। हो सकता है अधिक लोगों को देखकर आपका बच्चा परेशान हो जाए।
  • इस कार्यक्रम के दौरान बच्चे को भारी-भरकम ड्रेस पहनाने से बचें। इससे बच्चा असहज महसूस करने लगता है। इसके अलावा उसके शरीर पर रेशेज की समस्या भी हो सकती है। इसलिए बच्चे को हल्के व ढीले कपड़े पहनाएं। 
  • इस संस्कार के दौरान कई जगह कई लोग बच्चे को खाना खिलाते हैं। इस मौके पर आपको थोड़ा अलर्ट होने की जरूरत है। दरअसल छोटी उम्र में बच्चा बहुत ज्यादा भोजन पचा नहीं सकता, इसलिए उसे ज्यादा खिलाने से बचें।

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कमैंट्स()
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| Jul 30, 2018

@anu kotadiya जी नमस्कार, हिंदु धर्म के अनुसार सभी 16 संस्कारों के बारे में आपको इस ब्लॉग में जानकारी मिल जाएगी। आप से निवेदन है कि आप इस ब्लॉग के लिंक को जरूर क्लिक करें। धन्यवाद https://www.parentune.com/parent-blog/hindu-dharm-ke-16-sanskaar/2840

  • रिपोर्ट

| Jun 24, 2018

kya ap Hume 16 sansankar ke bare me Bata sakte he

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